Monday, November 8, 2021
Monday, April 13, 2020
विलियम वेल्स ब्राउन: ‘क्लोटेल’ प्रेसीडेंट की बेटी
“...विशिष्ट निजी गुणों वाली बहुत सारी मोलाटो लड़कियाँ होंगी: उनमें से दो अति उत्तम। कोई जेंटलमैन या लेडी खरीदना चाहें तो वे उपरोक्त गुलामों को एक सप्ताह के ट्रायल के लिए ले सकते हैं...।” – विलियम वेल्स ब्राउन ‘क्लोटेल’
विलियम वेल्स ब्राउन एक गुलाम के रूप में 1814 में कैन्टकी में पैदा हुआ था। उसकी माँ गुलाम थी और उसका पिता एक श्वेत व्यक्ति, गुलामों का मालिक था। उसके अंदर शुरु से खुद्दारी थी। उसके साथ एक गुलाम की भाँति किया गया व्यवहार उसे सदैव उकसाता कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए कुछ करे। क्या कर सकता था वह? उन दिनों एक गुलाम के पास कौन-सी ऐसी शक्ति थी कि वह अपनी अस्मिता, अपनी स्वतंत्रता के लिए कुछ उपाय कर सके। उस समय गुलाम पूर्ण रूप से शक्तिहीन, दमित और शोषित हुआ करते थे। इसके बावजूद कुछ लोगों का ज़मीर उन्हें ऐसी गलीज जिंदगी से निज़ात पाने के लिए सदा उकसाता रहता। वे इस अमानवीय स्थिति से निकल भागने के लिए कसमसाते रहते। विलियम बराबर सोचता क्या वह स्वार्थी बन जाए, केवल अपनी स्वतंत्रता की चिंता करे। अपने परिवार को छोड़ दे? नहीं वह अकेले स्वतंत्र नहीं होना चाहता था। अपनी माँ-बहन की स्वतंत्रता भी उसके लिए उतनी ही मायने रखती थी जितनी उसकी खुद की स्वतंत्रता। 1833 में उसने अपनी माँ के साथ मिल कर गुलामी से निकल भागने की योजना बनाई। मगर सफ़ल नहीं हुआ। उन दिनों किसी गुलाम के भागने का प्रयास भयंकर अपरध था। इस अपराध की सजा के तौर पर उसकी माँ को काम करने धुर दक्षिण में दूसरी जगह भेज दिया गया। स्वतंत्रता का उसका स्वप्न टूट गया। काफ़ी समय तक वह दोबारा निकल भागने की बात से बचता रहा। मगर स्वतंत्रता की इच्छा बलवती थी, एक बार विलियम ने फ़िर कोशिश की। इसके पहले कि वह भागता, मालिक का भतीजा प्लांटेशन पर रहने आया। संयोग से उसका नाम भी विलियम था अत: गुलाम विलियम से उसका नाम छीन लिया गया। नाम छिनने का मतलब है व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त हो जाना। अब उसे न केवल अपनी स्वतंत्रता पानी थी बल्कि अपना नाम भी वापस पाना था। यह उसके अस्तित्व का संकट था। इसले लिए उसे बहुत संघर्ष करना पड़ा
विलियम भले ही शुरु में पढ़ा-लिखा नहीं था पर वह बड़ा बुद्धिमान था। उस समय गुलामों का पढ़ना-लिखना कानूनन जुर्म था। विलियम गुलाम-प्रथा को गलत और अमानवीय मानता था। इतना ही नहीं वह खुल कर इस प्रथा की आलोचना करता था। उसने एफ़्रो-अमेरिकन स्वतंत्रता के लिए खूब संघर्ष किया। भाषण दिए, किताबें लिखीं और अन्य लोगों को पढ़ाया। मगर यह सब वह तब कर सका जब भाग कर वह दक्षिण अमेरिका की गुलामी से दूर गया। उसने अपनी मेहनत और कुछ लोगों के सहयोग से लिखना-पढ़ना सीखा। वह एक कुशल वक्ता था, अपने निर्भीक भाषणों के कारण वह गृहयुद्ध के पूर्व एक चर्चित व्यक्ति बन गया। जो लोग अमेरिका के स्वतंत्रता, भाईचारे और न्याय के सिद्धांतों की थोथी बातें करते, उनका वह कटु आलोचक था। अमेरिकी राष्ट्रपति (1801-1809) थॉमस जेफ़रसन का वह कटु आलोचक था।
व्यक्ति को बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। जिन लोगों का बहुत सम्मान होता है, जिन्हें बहुत संवेदनशील, बुद्धिमान और जानकार माना जाता है वे भी कभी-कभी इतनी निचली स्तर की बात कह देते हैं कि उनकी अक्ल पर शक होने लगता है। कुछ लोग पहले मानते थे और आज भी कुछ लोग मानते हैं कि अश्वेत लोग मानसिक-बौद्धिक रूप से कमतर होते हैं अत: गुलाम बनने के ही योग्य होते हैं। ऐसे लोगों ने, जिनमें थॉमस जेफ़रसन भी थे, जिसने आगे चल कर फ़िलिस वीटले की आलोचना करते हुए कहा कि उसकी कविताओं का स्तर बहुत नीचा था। मिथकों का उसे ठीक से ज्ञान नहीं था। वे उसके कवि होने पर ही प्रश्न खड़ा करते हैं। सोचना होगा क्या सारी कविताएँ एक ही मानदंड से नापी जानी चाहिए? वीटले का लैटिन ज्ञान कमजोर हो सकता है, तो क्या उसे कविताएँ लिखने, खुद को अभिव्यक्त करने का अधिकार नहीं है? जेफ़रसन की दुमुँही राजनीति, उसकी कथनी और करनी के अंतर पर विलियम खुल कर बोलता। उसने इसी बात को अपने उपन्यास ‘क्लोटेल’ में दिखाया है। इस उपन्यास को ‘द प्रेसीडेंट्स डॉटर’ के नाम से भी जाना जाता है, यह किसी एफ़्रो-अमेरिकन द्वारा लिखा गया पहला उपन्यास है। प्रकाशन के पहले साल में इसकी 11,000 प्रतियाँ बिक गई। यह उस साल (1840) का बेस्टसेलर था। इसके अलावा विलियम ने 1847 में ‘नरेटिव ऑफ़ विलियम ड्ब्ल्यू. ब्राउन, ए फ़ूजिटिव स्लेव, रिटन बाई हिमसेल्फ़’ नाम से अपनी कहानी भी लिखी। 1853 में ‘ए नरेटिव्स ऑफ़ स्लेव लाइफ़ इन दि यूनाइटेड स्टेट्स’ और 1863 में ‘द ब्लैक मैन: हिज एंटेसेडेंट्स, हिज जीनियस, एंड हिज एचीवमेंट्स’, ‘द निग्रो इन दि अमेरिकन रेबेलियन’ आदि उसके अन्य कार्य हैं।
ब्राउन के गुलामी से निकल भागने के बाद 1850 में फ़्यूजिटिव स्लेव कानून के साथ में अमेरिकी गुलामों की इंग्लैंड शरण लेने में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। गुलामों के जीवन को दुनिया के सामने लाने का अभूतपूर्व कार्य उसने किया। इसमें विलियम अकेला नहीं था। फ़्रेडरिक डगलस और विलियम वेल्स ब्राउन दोनों गुलाम जीवन को दुनिया के सामने लाने के लिए प्रसिद्ध हैं, दोनों ने 1840 के अंतिम दौर में इंग्लैंड की यात्रा की जहाँ उत्साह और जोश के साथ उनका स्वागत हुआ। एक सूचना के अनुसार ब्राउन ने पाँच साल के भीतर करीब एक हजार भाषण दिए और बीस हजार मील की यात्रा की। ब्राउन के उपन्यास से युक्ति लेते हुए कई गुलामों ने छद्म वेश में भागने का काम किया और सफ़लता पाई। एलेन क्राफ़्ट ने ऐसा ही किया। उसने खुद को अश्वेत स्त्री के रूप में दिखाया। कई गुलाम श्वेत रक्त मिश्रण के कारण हल्के रंग के होते और आसानी से श्वेत लोगों के बीच घुल-मिल सकते थे। स्वयं ब्राउन का रंग काफ़ी साफ़ था। इसलिए जब वह गुलामों की दशा का चित्रण करता तो कुछ लोग उसकी आलोचना भी करते थे। कुछ लोग कहते कि यह उसके श्वेत रक्त का प्रभाव है, इसीलिए उसके मन में अश्वेत गुलामों के प्रति दया-सहानुभूति का भाव है। दया-ममता जैसे मानवीय गुण अश्वेतों में कैसे हो सकते हैं। एलेन क्राफ़्ट ने एक अन्य विलियम के साथ भाग कर 1851 में लीवरपूल में शरण ली और विलियम वेल्स ब्राउन के साथ इंग्लैंड और स्कॉटलैंड का दौरा किया। इन लोगों ने 1851 के ग्रेट एक्जीबिशन में जा कर अमेरिका में गुलामों की स्थिति की ओर पर्यटकों तथा अन्य लोगों का ध्यान आकर्षित किया। एक अच्छी बात हुई, ब्रिटिश पत्र-पत्रिकाओं ने इनकी बातों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। ब्राउन ने अपने यात्रा वृतांत ‘थ्री ईयर्स इन यूरोप, ओर, प्लेसेस आई हैव सीन एंड पीपुल आई हैव मेट’ में लिखा है कि वह भागते समय हैरिएट मार्टिनियू के यहाँ रहा। उसके अनुसार वह विटिंगटन क्लब का ऑनरेरी सदस्य चुना गया जिसमें करीब 2,000 सदस्य थे। इस क्लब में लॉर्ड ब्रौहम, चार्ल्स डिकेंस, रेरॉल्ड मार्टिन थाकरे जैसे कई नामी-गिरामी लोग शामिल थे। गुलामी विरोध (एन्टीस्लेवरी) के लिए किया गया उसका प्रयास ऐतिहासिक है। उसने न केवल उपन्यास, कविताएँ, यात्रा विवरण, आलेख लिखे, भाषण दिए वरन गुलामों का इतिहास जानने के लिए भी उसका लेखन प्रमुख स्रोत बना। उसके प्रयास के चलते इंग्लैंड और अमेरिका दोनों स्थानों पर गुलामों के प्रति लोगों का नजरिया बदला। लोग उनकी सहायता को आगे आने लगे।
जिंदगी के पहले बीस साल, घर और खेत पर एक गुलाम की तरह जीवन बिताने वाले ब्राउन को जीवन का कटु अनुभव था। इस समय उसने कई अन्य कार्य जैसे प्रिंटर का सहायक, मेडिकल ऑफ़िस में सहायक के रूप में भी काम किया। ये अनुभव आगे चल कर उसके जीवन की पूँजी बने। उसने जेम्स वॉकर नामक गुलाम व्यापारी के सहायक का काम किया और कई बार सेंट लुई से मिसीसिपी नदी तक की यात्रा की। अंतत: 1834 में वह न्यू ईयर डे को गुलामी से भाग निकला। ये सारे अनुभव उसके लेखन में सहायक हुए। ओहायो में एक व्यक्ति बेल ब्राउन ने उसकी केनडा जाने में सहायता की, उसे शरण दी, खाना-पीना और सुरक्षा दी। इसी ओहाओ क्वेकर से उसने अपना बीच का और अंतिम नाम ग्रहण किया लेकिन पहला नाम अपना खुद का ही रखा। इस तरह उसने अपनी स्वतंत्रता और अपना नाम दोनों कमाया। स्वतंत्र होने के बाद भी उसके मन में कचोट थी। वह अपनी बहन की गुलाम के रूप में लगाई गई बोली और बिक्री को कभी न भूल सका। शायद ‘क्लोटेल’ का गुलाम नीलामी का दृश्य उसी स्मृति की आवृति है। ब्राउन ने कई साल लेक एरिक पर स्टीमबोट चलाई और न्यू यॉर्क के बफ़ैलो में अंडरग्राउंड रेलरोड में कंडक्टर के रूप में भी संबद्ध रहा। 1843 में उसने वेस्टर्न न्यू यॉर्क एन्टीस्लेवरी सोसाइटी से जुड़ कर अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘नरेटिव ऑफ़ विलियम ड्ब्क्यू ब्राउन, ए फ़्यूजिटिव स्लेव, रिटन बाई हिमसेल्फ़’ लिखी जिसके 1850 से पहले चार अमेरिकन और पाँच ब्रिटिश संस्करण निकले। बाद में उसने अपनी एक और आत्मकथा ‘माई सदर्न होम, ओर द साउथ एंड इट्स पीपुल’ नाम से लिखी। विलियम वेल्स ब्राउन विश्वविख्यात हो गया। वह अपनी बात कहने पेरिस में हुए अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन में भी गया। 1853 में उसका प्रसिद्ध उपन्यास ‘क्लोटेल’ आया, इसके एक साल बाद वह अमेरिका लौट आया और अपने लेखन में जुट गया। ब्राउन के नाम के साथ एक और प्रथम जुड़ा हुआ है। ‘द इस्केप, ओर ए लीप फ़ॉर फ़्रीडम’ किसी एफ़्रो-अमेरिकन द्वारा लिखा गया प्रथम नाटक है। बाद में उसने ‘क्लोटेल’ नाम से के कई अलग-अलग लेखन किए। ‘क्लोटेल मिराल्डा’, ‘ओर द ब्यूटीफ़ुल क्वाड्रून’, ‘‘क्लोटेल: ए टेल ऑफ़ द सदर्न स्टेट्स’, ‘क्लोटेल, ओर द कलर्ड हिरोइन’ उसके इस शृंखला के अन्य कार्य हैं।
उस समय के अफ़्रो-अमेरिकन लोग देख रहे थे कि अखबार, मैगजींस और किताबों में उन्हें मनुष्य के रूप में चित्रित नहीं किया जा रहा है। अत: उसने अपने लेखन में अपनी नस्ल के लोगों को प्रमुखता से चित्रित किया। यह साहित्य उस समय के प्रचलित अमेरिकी साहित्य से भिन्न था। इसके मूल्यांकन का कोई पैमाना तब उपलब्ध न था। मगर इन अश्वेत लेखकों के ईमानदार लेखन से दुनिया को इनकी वास्तविक स्थिति की जानकारी मिली। विलियम ने बेबाक लिखा। भागते समय के अपने दुर्दांत अनुभवों को उसने सच्चाई के साथ बयान किया। गुलामी से भागते समय उसे छिप कर मौसम की मार का सामना करते हुए भूखे रहना पड़ा और चोरी से अपना पेट भरना पड़ा। जब उसे भुट्टे मिल गए तो उसने चोरी की परवाह न करते हुए उनसे अपनी भूख मिटाई।
अमेरिका का तीसरा प्रेशीडेंट थॉमस जेफ़रसन 1797 से 1801 तह वाइस प्रेशीडेंट था और 1801 से1809 तक प्रेशीडेंट। थॉमस जेफ़रसन एक ओर तो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की बात करता दूसरी ओर खुद गुलाम पालता था। जेफ़रसन को क्रांतिदूत, महान और न जाने किस-किस विशेषण से नवाजा जाता है, लेकिन उसके मन में अश्वेतों को इस सारी योजना में शामिल करने का ख्याल स्वप्न में भी नहीं था। ब्राउन के मन में उसके प्रति कोई श्रद्धा न थी बल्कि वह उसकी असलियत उजागर करना चाहता था और इसीलिए उसने अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘क्लोटेल’ लिखा। उसने 1847 में एंटीस्लेवरी की एक मीटिंग में कहा कि यदि यूनाइटेड स्टेट्स स्वतंत्रता का पालना है तो उसने बच्चों को मौत का झूला दिया है। उस समय बहुत सारे लोगों के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि कोई अश्वेत इतने तार्कित तरीके से सोच सकता है। उसके विरोधी उसकी प्रतिभा का श्रेय उसके श्वेत रक्त को देते थे। कैसी विडम्बना है कि बुद्धि को नस्ल से जोड़ कर देखा जाता है।
अपने उपन्यास ‘क्लोटेल’ में ब्राउन दिखाता है कि करेर नाम की एक अश्वेत गुलाम जेफ़रसन की रखैल है, जिससे उसके बच्चे भी हैं। श्वेत रक्त के मिश्रण से उत्पन्न अश्वेत बच्चे अमेरिका में मुलाटो कहलाते हैं। विडंबना यह थी कि मुलाटो बच्चों की जिम्मेदारी उनका श्वेत पिता नहीं लेता था। वे बच्चे अपनी अश्वेत माँ का दायित्व होते थे, बच्चों का भाग्य अश्वेत गुलाम माँ से जुड़ा होता था। मुलाटो स्त्रियाँ अपने सौंदर्य के लिए जानी जाती हैं, इनका ऊँचा से-ऊँचा दाम लगता है। अमेरिका के दक्षिण में यह प्रथा जोरों से प्रचलित थी। अमेरिका के उत्तर के लोगों का ध्यान इस कुप्रथा की ओर ब्राउन जैसे अश्वेत लेखकों ने आकर्षित किया। ऐसी ही एक स्त्री जेफ़रसन की रखैल है, मगर सार्वजनिक रूप से जेफ़रसन ने उसे कभी स्वीकार नहीं करता है। उसे और बच्चों को पहचानने, उनके अस्तित्व से इंकार करता है। क्लोटेल जेफ़रसन की इसी स्त्री से उपन्न एक संतान है और उसी के निलामी के तख्ते पर खड़े होने का बड़ा मार्मिक चित्रण विलियम ब्राउन ने इस उपन्यास में किया है। आगे चल कर क्लोटेल अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करती है। लेकिन उसका अंत बड़ा दर्दनाक होता है।
विलियम बताता है कि ये अश्वेत स्त्रियाँ भी कोई बड़ी आकांक्षा नहीं पालती थीं। अच्छे कपड़े और श्वेत मालिक की रखैल बन कर अपना जीवन सार्थक मान लेती थीं। मुलाटो लड़कियाँ और स्त्रियाँ नीग्रो पार्टियों और नृत्य कार्यक्रमों (बॉल्स) की जान होती थीं। गुलामों की बाकायदा विज्ञापन के साथ खरीद बिक्री होती थी। एक साल ऐसा ही एक विज्ञापन निकला। विज्ञापन में लिखा था कि नवम्बर 10 तारीख, सोमवार बारह बजे 38 गुलाम बिक्री के लिए वर्जीनिया राज्य की राजधानी में उपलब्ध होंगे। नीग्रो अच्छी हालत में है, उनमें से कई युवा हैं, कई मेकेनिक्स हैं, कई खेती के काम में निपुण हैं, हल में जुतने योग्य, दूध पिलाती स्त्रियाँ हैं। कुछ विशिष्ट गुणों वाली हैं। जो भी अपनी संपत्ति बढ़ाना चाहता है, शक्तिशाली और स्वस्थ नौकर चाहता है उसके लिए यह एक विशिष्ट अवसर है। खास गुणों वाली कई मुलाटो लड़कियाँ उनमें भी सर्वोत्तम गुणों वाली दो मुलाटो लड़कियाँ बिक्री के लिए वहाँ होंगी। कोई भी पुरुष या स्त्री इन गुलामों को एक सप्ताह के ट्रायल पर ले सकता है, जिसके लिए कोई मूल्य नहीं देना होगा। इन्हीं में करेर और उसकी दो बेटियाँ क्लोटेल और एल्थेसा भी थीं। इन्हीं के लिए सर्वोत्तम गुणों वाली लिखा गया था। करीब चालीस की उम्र वाली करेर एक बहुत अक्लमंद औरत थी। वह ग्रेव्स नामक गुलाम मालिक की सम्पत्ति थी और अपने मालिक से अनुमति ले कर अपनी युवावस्था में करीब बीस साल तक वह गुलाम के एक युवा मालिक की हाउसकीपर थी। बाद में उसने धोबन का काम किया। जिस युवा गुलाम मालिक के यहाँ वह जवानी में थी उसका नाम थॉमस जेफ़रसन था। जेफ़रसन से उसकी दो बेटियाँ हुई। सरकारी नियुक्ति के कारण जब जेफ़रसन वॉशिंगटन चला गया, बाद में राष्ट्रपति भी बन गया तो करेर पीछे छूट गई। और धोबन का काम करने लगी क्योंकि उसे बच्चियाँ पालने के साथ-साथ ग्रेव्स को किराया चुकाना होता था।
जब उसका मालिक ग्रेव्स मरा तब क्लोटेल सोलह और एल्थेसा चौदह साल की थी। अमेरिका में अश्वेत काफ़ी जल्दी बड़े होते हैं उनकी कद-काठी भी विकसित होती है। ये दोनों लड़कियाँ भी काफ़ी स्वस्थ थीं। करेर शुरु से अपनी बेटियों को लेडी बनाने का ख्वाब देख रही थी अत: उसने उनसे कभी कोई काम नहीं करवाया था। चूंकि वे काम नहीं करती थी अत: करेर को उनके एवज का दाम भी चुकाना पड़ता था। खास धोबन होने के कारण उसकी धुलाई का रेट बहुत अधिक था। इतना सब करके करेर और उसकी बेटियाँ एशो-आराम का जीवन बिता रहीं थीं। वह पार्टियों और नृत्य के समय अपनी बेटियों की ओर लोगों का खास ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती। मगर बकरे मी माँ कब तक खैर मनाती। इन पार्टियों और महफ़िलों को नीग्रो बॉल कहा जाता था मगर इनमें श्वेत लोगों की अच्छी खासी तादाद उपस्थित रहती थी। असल में इनमें मुलाटो और नीग्रो लड़कियाँ और श्वेत पुरुष ही हुआ करते थे। पुरुषों में व्यापारी और उनके क्लर्क रहते। ऐसी ही एक पार्टी में रिचमंड के एक धनी आदमी के बेटे होरासिओ ग्रीन से क्लोटेल सर्वप्रथम परिचित हुई। बाइस साल का यह नौजवान कॉलेज की शिक्षा समाप्त करके लौटा था और क्लोटेल शहर की काली-गोरी सर्वोत्तम सुंदरी थी। ग्रीन का क्लोतेल के प्रति आकर्षण किसी से छिपा न रहा। अपनी बेटी की जीत पर करेर फ़ूली नहीं समा रही थी। होरासिओ ग्रीन उनके घर बराबर आने लगा। उसने जल्द ही क्लोटेल को खरीदने का वायदा भी किया। करेर अपनी बेटी की स्वतंत्रता के स्वप्न देखने लगी। एक शाम युवा ग्रीन ने क्लोटेल के पास बैठ कर उसे गुलामों की बिक्री का विज्ञापन दिखाया, जाते-जाते कहा कि तुम बहुत जल्द स्वतंत्र और खुद मुख्तार होने जा रही हो।
नीलामी वाले दिन खूब भीड़ जुटी। गुलाम पालने वाले, गुलाम व्यापारी और अन्य लोगों के साथ होरासियो ग्रीन भी अपनी चेकबुक के साथ वहाँ उपस्थित था। पहले कम मूल्य वाले गुलामों की नीलामी हुई। पति-पत्नी अलग-अलग लोगों द्वारा खरीद कर भिन्न दिशाओं में ढ़केल दिए गए। भाई-बहन जुदा हुए, माताओं ने अपने बच्चों को अंतिम बार देखा। सब बिलख रहे थे। फ़िर और ऊँचे दाम वाले गुलामों की नीलामी हुई तथा सबसे अंत में करेर और उसकी बेटियों को सामने लाया गया। नीलामी के पटरे पर सबसे पहले करेर को चढ़ाया गया। काँपती हुई करेर को एक व्यापारी ले चला। उसी व्यापारी ने क्लोटेल से कम सुंदर करेर की छोटी बेटी एल्थेसा को एक हजार डॉलर में खरीदा। सबसे अंत में क्लोतेल को नीलामी के मंच पर लाया गया। उस दिन की सबसे बड़ी बोली लगनी थी। उसे देखते ही भीड़ में उत्तेजना की लहर दौड़ गई। उसका रंग करीब-करीब गोरा था और सुंदरता ऐसी ही हर व्यापारी अपने मन में उस पर दाँव लगाने की इच्छा लिए हुए था। उसके काले, घुँघराले बाल सलीके से बँधे हुए थे। अपनी लंबी काया में वह सौंदर्य की प्रतिमा लग रही थी। नीलामी करने वाले ने कहा कि मिस क्लोटेल को अंत के लिए सुरक्षित रखा गया क्योंकि वह सबसे अधिक कीमती है। उसके स्वास्थ्य और सौंदर्य की लंबी-चौड़ी तारीफ़ की गई और पाँच सौ से बोली लगनी शुरु हुई।
विलियम बेल्स ब्राउन ने अपने उपन्यास में इस नीलामी का बड़ा सटीक और मर्मांतक चित्रण किया है। जब उसके नैतिक गुणों का बखान हुआ तो बोली सात सौ डॉलर पर पहुँची। उसकी बुद्धिमता के लिए आठ सौ और उसकी ईसाइयत के लिए किसी ने नौ सौ की बोली लगाई। बढ़ती बोली बारह सौ डॉलर पर जा कर ठिठक गई। आँसू भरी आँखों से क्लोटेल कभी अपनी माँ-बहन को देखती कभी उस युवक की ओर देख रही थी, जिसके द्वारा वह खरीदे जाने की आशा कर रही थी। एक बेबस लड़की की भावनाओं से बेखबर भीड़ हँसने, बतियाने, मजाक करने, चुटकुले सुनाने, धूम्रपान करने, थूकने में मशगूल थी। फ़िर नीलामी करने वाले ने क्लोटेल के कौमार्य की प्रशंसा शुरु की। बताया कि लड़की सदा अपनी माँ की देखरेख में रही है और अभी तक अछूती है। बोली थोड़ा औअर आगे बढ़ी तथा पंद्रह सौ डॉलर पर आ कर एकदम ठहर गई। सोलह साल की एक लड़की की हड्डियाँ, माँस-पेशियाँ, रक्त-मज्जा पाँच सौ, उसका नैतिक चरित्र दो सौ, बुद्धि एक सौ, ईसाइयत तीन सौ और कौमार्य चार सौ डॉलर में नीलाम हो गया। लेखक कटाक्ष करते हुए कहता है कि यह हुआ एक ऐसे स्थान में जहाँ चर्च के लंबे निशान स्वर्ग की ओर तने हुए हैं, जहाँ के पादरी अपने प्रवचनों में कहते हैं कि गुलामी प्रथा ईश्वर प्रदत्त है। ऐसे अमानुषीय कृत्य को किन शब्दों में बताया जाए? यह वह अपराध है जो जागरुक और क्रिश्चियन लोगों द्वारा किया जाता, उनके लिए किया जाता है। सरकार अपनी शक्ति ऐसे कामों को रोकने के बजाय बढ़ावा देने में लगाती है, वह सरकार जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का दावा करती है। होरासिओ ग्रीन ने पंद्रह सौ डॉलर में क्लोटेल को खरीदा। उसने सबसे ऊँची बोली लगाई थी। यह उपन्यास बताता है कि इस तरह राष्ट्रपति थॉमस जेफ़रसन, स्वतंत्रता और समानता की घोषणा करने वाले जेफ़रसन की बेटियाँ नीलाम हुई।
इस व्यंग्यात्मक-मार्मिक उपन्यास के रचनाकार विलियम वेल्स ब्राउन की मेसाच्युसेट्स के चेल्सिया में छः नवंबर 1884 को मृत्यु हुई।
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इसे और विस्तार से वाणी प्रकाशन से आई पुस्तक ‘अफ़्रो-अमेरिकन साहितय: स्त्री स्वर’ में पढ़ा जा सकता है।
Thursday, March 5, 2020
गोजर
जून का महीना था। बाहर सूरज का गोला आकाश पर चढ़ा अगन बरसा रहा था। धरती तप रही थी। बारिश का दूर-दूर तक ठिकाना न था। कमरे के भीतर भी उमस भरी गर्मी और घुटन थी। कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। कहीं आराम न था। बिस्तर जल रहा था। नीचे नंगे फ़र्श पर लेट कर भी छटपटाहट बरकरार थी। तभी छत की गर्मी से बिलबिलाता हुआ एक गोजर धरन के बीच से फ़र्श पर ठीक मेरी बगल में चू पड़ा। मैं सिहर कर सिमट गया। थप्प की आवाज सुनते ही उनकी नजर जमीन पर गिरे गोजर पर पड़ी। वे बड़ी फ़ुर्ती से उठे। लपक कर रसोईघर में गए। वहाँ से चिमटा उठा लाए। गोजर को चिमटे से पकड़ कर दरवाजा खोल कर छत पर गए। गोजर को धूप से जलती छत पर रख कर ईट से दबा दिया। वापस आ कर चुपचाप लेट गए। मानो कुछ हुआ ही न हो। मैं इस दृश्य को देख रहा था। ईट से दबा, गर्मी से छटपटाता गोजर सैंकड़ों पैरों के होते हुए भी मजबूर था। चल नहीं सकता था, बच नहीं सकता था। अपनी जान नहीं बचा सकता था। भाग नहीं सकता था। वह छत की जमीन पर असह्य तपन से छटपटा रहा था। मैं देख रहा था। मैं देख रहा था ईट से दबा हुआ वह गोजर तड़फ़-तड़फ़ कर मौत के करीब सरकता जा रहा था।
आज यह कोई नहीं बात न थी। अक्सर गर्मियों में घर की छत तपने से धरन के बीच से गोजर टपकता था। और वे उसे चिमटे से पकड़ कर छत पर ले जा कर ईट से दबा देते, जहाँ पड़ा-पड़ा वह दम तोड़ देता। दिन हुआ तो ईट के बोझ और छत की आग से जल्द शांत हो जाता। रात हुई तो रात भर ईट से दबा रहता और सुबह होने पर सूरज के चढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे ठंडा होता। कभी-कभी सई साँझ को टपकता, तब तो शाम, रात, सुबह ईट से दबा रहता, छटपटाता रहता, सुन्न पड़ता जाता और अगली दोपहर को ही पूरा मर पाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि गोजर काफ़ी तगड़ा होता और उन्हें पूरी सही-सलामत ईट न मिल पाती। अद्धे-पौने ईट से ही वे उसे दबा देते। सतह समतल न होने के कारण वह गोजर पर सटीक न बैठती और नजर चूकते ही थोड़ी देर में गोजर गायब हो जाता। मगर ऐसा कभी-कभार ही हो पाता। ज्यादातर उनका ही पलड़ा भारी रहता।
इस सारी प्रक्रिया के दौरान मैं मूक भयभीत दर्शक बना रहता। न ही प्रतिरोध करता, न ही सहायक बनता। मैं चीखना चाहता था, रोकना चाहता था उन्हें, बचाना चाहता था गोजर को। उनके हाथ से चिमटा खींच कर फ़ेंक देना चाहता था। चिल्ला-चिल्ला कर कहना चाहता था उसे मत मारो। मत मारो। गोजर पर से ईट उठा कर उसे भगा देना चाहता था, उसे बचाना चाहता था। पर कुछ करता नहीं था, मुँह से बोल नहीं फ़ूटते थे। भय से भीतर-भीतर काँपता रहता था।
मेरे सारे शरीर में सिहरन हो रही थी। वह छूटने के लिए छटपटा रहा था, पर छूट नहीं पा रहा था। वह तड़फ़-तड़फ़ कर मर रहा था। पर यह क्या? यह क्या होने लगा? वह गोजर कब ईट के नीचे से निकल कर मेरे शरीर पर आ गया। और मेरे शरीर में समाने लगा। अरे यह क्या? मैं ही गोजर में बदलने लग रहा हूँ। मुझे ही छत की गर्मी जला रही है। मैं कब और कैसे छत पर पहुँच गया? मेरे ऊपर इतनी बड़ी ईट कब और कैसे आ गई। किसने रख दी मेरे ऊपर यह इतनी भारी-भरकम ईट? मैं गर्म तवे पर पड़ा हूँ। हिलना चाहता हूँ मगर हिल नहीं पाता हूँ, हिल नहीं सकता हूँ। निकल भागने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। सब उपाय बेकार हैं। हाथ-पैर सब जकड़े हुए हैं। मैं पूरी तरह ईट के नीचे दबा हुआ हूँ। ईट भारी और भारी होती जा रही है। बड़ी और बड़ी होती जा रही है। उसके नीचे दबे हुए मेरा दम घुटता जा रहा है। साँस रुकी जा रही है। छटपटाना चाहता हूँ, पर छटपटा भी नहीं सकता हूँ। हिल भी नहीं पा रहा हूँ। बोझ बढ़ता जा रहा है। चिल्लाना चाहता हूँ मगर गले से आवाज नहीं निकल रही है। हलक गर्मी और प्यास के मारे सूखा जा रहा है। मगर पानी कहाँ है? चारो ओर तेज झुलसाती हुई, आँखों को चुँधियाती हुई तेज धूप है। असह्य गर्मी है। ऊपर से बरसती आग और नीचे से जलती छत के बीच ईट से दबा मैं मर रहा हूँ। जबान ऐंठ रही है। आँखें बाहर निकली पड़ रही हैं। हलक सूख रहा है। गला घुट रहा है। दम निकल रहा है।
अरे! यह क्या सारे शरीर पर फ़फ़ोले उभरने लगे हैं। मानो चेचक निकल रही हो। सारा शरीर फ़फ़ोलों से भर गया है। फ़फ़ोले मवाद से भर गए हैं। पीब हिलने से हर फ़फ़ोले में सैंकड़ों सूइयाँ चुभ रही है, टीस हो रही है। उफ़! कितनी तकलीफ़, कितनी जलन हो रही है। शरीर से आग निकल रही है। आग के साथ-साथ शरीर से ये क्या निकल रहा है? अरे! मैं तो सच में गोजर बनता जा रहा हूँ। मेरे शरीर के दाएँ-बाएँ दोनों ओर सैंकड़ों पैर उगते आ रहे हैं। पैर लंबे और लंबे होते जा रहे हैं। पैर हिल रहे हैं मगर लय में नहीं, रिदम में नहीं। वे छटपटा रहे हैं, बेतरतीब छटपटा रहे हैं। पैरों की जकड़न मेरे शरीर पर बढ़ती जा रही है। मेरा शरीर अमीबा की तरह बँटता जा रहा है, हर हिस्सा एक और गोजर बन रहा है। चारो ओर बस गोजर-ही-गोजर हैं। अब तो हिलना-डुलना भी संभव नहीं है। पैर हिलाना चाहता हूँ पर एक भी पैर नहीं हिलता है। अब सिर्फ़ जकड़न है। छटपटाहट बेबसी में बदलती जा रही है। घुटन बढ़ रही है। लग रहा है कोई दोनों हाथों से मेरा गला दबा रहा है। मैं चीखना चाहता हूँ पर मुझ पर बोझ इतना है कि चीख नहीं निकलती है। मेरे गले से आवाज नहीं निकल रही है। चीख घों-घों बन कर रह गई है। हाथ-पाँव सब बेजान हो गए हैं। बस गले से घुटी-घुटी-सी आवाज निकल रही है।
पत्नी ने झकझोर कर उठा दिया। पहले कुछ समझ में नहीं आया कि कहाँ हूँ, क्या हो रहा है। गला अभी भी दबा हुआ है। हलक सूखा है, साँस धौकनी-सी चल रही है। पूरा शरीर काँप रहा है। पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ है। “कितनी बार कहा है, सीने पर हाथ रख कर मत सोया करो।” पत्नी ने कहा और अँधेरे में टटोल कर ढक्कन हटा कर पानी का गिलास मेरे हाथ में थमा दिया। “लो पानी पीयो, लगता है कोई बुरा सपना देख रहे थे। गले से घों-घों की आवाज आ रही थी।” मैं अभी भी स्थिर नहीं हो पाया था। पानी पी कर मैंने गिलास बगल की मेज पर रख दिया। पत्नी अब तक लेट चुकी थी। मैं भी लेट गया। अभी भी मेरा दिमाग पूरी तरह काम नहीं कर रहा था।
मेरे बालों में अँगुली फ़ेरती हुई पत्नी बोली, “करवट ले कर सो जाओ। दिन भर न जाने क्या-क्या उलटा-पुलटा सोचते रहते हो तभी बुरे सपने आते हैं।” पत्नी मेरी बेबसी, मेरी लाचारी, मेरा भय, मेरी सिहरन कभी पूरी तरह नहीं समझ पाएगी। मैं उसे समझा भी नहीं सकता हूँ। क्या हम किसी को अपनी पूरी बात कभी समझा पाते हैं? समझा सकते हैं? थोड़ी देर में पत्नी सो गई। खर्राटे भरने लगी। मगर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी। मेरी आँखों में गोजर भरे हुए थे। मैं लेटे-लेटे सोचने लगा, शरीर पर ये फ़फ़ोले उगना, गोजर की तरह शरीर से सैंकड़ों पैर निकलना, ईट से दबे हुए जलती छत पर पड़े रहना, घुटना, तपन से छटपटाते हुए मौत की ओर धीरे-धीरे सरकना, क्या यह सब दिन भर की उलटी-सीधी बातें सोचने का नतीजा है? दिन में तो शायद इस भय, इस सिहरन, इस जकड़न से मैंने पीछा छुड़ा लिया है। मगर अभी भी बचपन में रोज-रोज की देखी वह क्रूरता, वह बेरहमी, वह छ्टपटाहट रात में मेरा पीछा करती है। उस क्रूरता के निशान मेरी आत्मा पर फ़फ़ोले बन कर पड़ गए हैं, जो रात को निकल आते हैं। रात को ईट से दबा, जलती-तपती छत पर मौत की ओर धीरे-धीरे सरकता गोजर मेरे सीने पर पुन: जिंदा हो जाता है। क्या इस जनम में अपने शरीर पर रेंगते इस गोजर से मुझे छुटकारा मिलेगा? अब तो मेरा सारा शरीर ही गोजर बनने लगा है। धीरे-धीरे मेरी भी आँख लग गई।
चिमटे से पूँछ दबा गोजर छत की मुरेड़ से उलटा लटका था। मैं फ़िर बेबस था, सिहर रहा था।
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(गोजर को काँतर भी कहते हैं)
(35-40 साल पहले लिखी मेरी पहली कहानी)
Tuesday, February 18, 2020
जन्मदिन की शुभकामनाएँ
जन्मदिन की शुभकामनाएँ पिताजी ! 14 Feb 2020
2003 के नोबेल पुरस्कार विजेता जॉन मैक्सवेल कट्जी अपने नोबेल प्रीतिभोज के अवसर पर बताते हैं कि पुरस्कार मिलने पर एक दिन उनकी संगिनी डोरोथी ने अचानक कहा, यदि उनकी माँ जीवित होती तो उनको कितना गर्व होता! अफ़सोस वे यह देखने को जीवित नहीं हैं! और तुम्हारे पिता! उन्हें तुम पर कितना गर्व होता! कितना ठीक कह रही थीं उनकी संगिनी। आगे वे कहते हैं कि यदि हम अपनी माँ के लिए नहीं तो आखीर किसके लिए ऐसे काम करते हैं? वे उदाहरण देते हुए कहते हैं जब हम बचपन में कोई पुरस्कार जीतते हैं तो दौड़ कर अपनी माँ को दिखाते हैं, ‘देखो मैंने यह जीता है।’
हम अपने भीतर की प्रत्येक गहन संवेदना अपनों से साझा करना चाहते हैं। चाहे वह पुलक हो अथवा भय। मिट्टी खाता बालक अपनी माँ को भी उस अनोखे स्वाद से परिचित कराना चाहता है (सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कविता) रोमांच से भरा बालक वीरबहूटी ला कर माँ को दिखाता है। दर्द तब तक कम नहीं होता है जब तक माँ चोट को फ़ूँक से उड़ा नहीं देती है। बड़े होने पर यह बालक हमारे अंदर कहीं दुबक जाता है लेकिन आह्लाद के समय, प्रसन्नता के समय यह उछल कर बाहर आ जाता है। हम अपनों के पास दौड़ कर पहुँच जाना चाहते हैं। यह सच है, हम बचपन से अपनी विजय के उल्लास में सबसे पहले अपने माता-पिता को शामिल करना चाहते हैं।
पता नहीं क्यों मैं बचपन से अपनी सारी खुशिया माताजी से नहीं अपने पिताजी से बाँटना चाहती थी जबकि यह होता नहीं था। कई बार जब आप अपनी प्रसन्नता लिए जैसे किसी विषय में कक्षा में सर्वाधिक अंक पा कर आप उन्हें दिखाते हैं और वो कह दें किसी को इस विषय (उनके प्रिय विषय) में भी तो सर्वाधिक अंक मिले होंगे। और आपके सारे उत्साह पर पानी फ़िर जाए। और जब आप साहित्य पढ़ना चाहें तो वे आपको इंजीनियर बनाने पर तुले हों और घर में कई दिन तक अबोला रहे!
ऐसे माता-पिता भी एक दिन आपकी सफ़लता पर गर्व करते हैं। आपके सामने भले न कहें मगर बाकी सबको आपके प्रकाशित लेख को दिखा कर बताते हों, देखिए यह मेरी बेटी का लिखा है। सबको शान से बताते हों कि उनकी बेटी कॉलेज में पढ़ाती है। आज वे कितने प्रसन्न होते जब उन्हें पता चलता कि उनकी बेटी की 19वीं पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। भले ही मेरे सामने न कहते या शायद अब तक सामने भी कहने लगते। आज वे नहीं हैं, मगर मैं इस अवसर पर उन्हें स्मरण कर रही हूँ। आज उनका जन्मदिन है।
जन्मदिन की शुभकामनाएँ पिताजी !
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Wednesday, August 15, 2018
फ़िल्मों में रवींद्रनाथ टैगोर
रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव न केवल बंगाल, भारत और विश्व के साहित्य पर पड़ा वरन उनका प्रभाव साहित्य के अलावा अन्य कलाओं पर भी पड़ा। एक कला जिस पर उनका सबसे अधिक प्रभाव दृष्टिगोचार होता है वह है फ़िल्म। फ़िल्म कला और विज्ञान (तकनीकि) का संगम होती है। टैगोर के काम पर दुनिया भर में करीब १०० फ़िल्में बनी हैं। इनमें से अधिकाँश रील नष्ट हो चुकी हैं। अब नेशनल फ़िल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन यह काम कर रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास-कहानियों पर कई फ़िल्म निर्देशकों ने फ़िल्म बनाई हैं साथ ही रवींद्रनाथ टैगोर पर भी। हेमेन गुप्ता ने ‘काबुलीवाला’, सुधेंदु राय ने ‘समाप्ति’, तपन सिन्हा ने ‘अतिथि’, ज़ुल वेलानी तथा नागेश कुकुनूर ने ‘डाक घर’, अडुर्थी सुब्बा राव ने ‘मिलन’(‘नौका डूबी’ पर आधारित), सुमन मुखर्जी ने ‘चतुरंग’, गुलजार ने ‘लेकिन’ (‘क्षुधित पाषाण’ पर आधारित), कुमार साहनी ने ‘चार अध्याय’ बनाई। स्वयं टैगोर ने ‘नटिर पूजा’ पर एक मूक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। सत्यजित राय और ऋतुपर्ण घोष ऐसे ही दो बड़े निर्देशक हैं जिन्होंने टैगोर के काम और उनके जीवन को अपने काम का हिस्सा बनाया है। सत्यजित राय तथा ऋतुपर्ण घोष दोनों फ़िल्म निर्देशकों ने रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन और कार्य पर अलग-अलग डॉक्यूमेंट्री बनाई। लेकिन दोनों एक-दूसरे से बहुत भिन्न डॉक्यूमेंट्री हैं।
सत्यजित राय रवींद्रनाथ से प्रत्यक्ष मिले थे। उनके मन में कवि की बड़ी गहरी छवि थी। उन्होंने १९६१ में ‘रबींद्रनाथ टैगोर’ नाम से श्वेत-श्याम लघु डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसमें उन्होंने रवि बाबू के जीवन और कार्य को लिया। राय रवि बाबू की आलोचना पक्ष को स्पर्श नहीं करते हैं। इस फ़िल्म की मूल पटकथा को सत्यजित राय के पुत्र संदीप राय ने अपनी किताब ‘ऑरिजनल इंग्लिश स्क्रिप्ट्स, सत्यजित राय’ में संकलित किया है। सत्यजित राय अपनी कई अन्य फ़िल्मों की भाँति इस फ़िल्म को भी अंतिम यात्रा से प्रारंभ करते हैं और तब टैगोर की वंशावलि, राजा राममोहन राय के धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक सुधार आंदोलन को प्रस्तुत करते हैं जबकि ऋतुपर्ण घोष अपनी डॉक्यूमेंट्री का आरंभ रवींद्रनाथ के बचपन से करते हैं। राय दिखाते हैं कि बचपन में टैगोर का पुकारू नाम रोबी था। फ़िल्म उनके स्कूली दिनों, उनके पिता की पत्रिका में उनकी प्रथम कविता प्रकाशन, लंदन में शिक्षा में नाकामयाबी से होती हुई उनके स्वप्न को शांतिनिकेतन में साकार होता हुआ दिखाती है। फ़िल्म में उनकी पत्नी, बच्चों की मृत्यु, उनका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा होना को प्रदर्शित करती है। इस फ़िल्म में गीतांजलि, नोबेल पुरस्कार और ‘सर’ की उपाधि की बात भी चित्रित है, और नाइटहुड लौटाने की बात भी। फ़िल्म विश्व भारती के लिए धन जुटाने के लिए किए गए विश्व भ्रमण, उनकी पेंटिंग्स तथा उनके ७०वें जन्मदिन पर प्रकाशित किताब, ‘द गोल्डन बुक ऑफ़ टैगोर’ पर भी केंद्रित होती है। टैगोर के विषय में अल्बर्ट आइन्सटीन, जगदीशचंद्र बोस, रोमेन रोलांड, महात्मा गाँधी जैसे विश्व के महान लोगों के उद्गार भी समेटे गए हैं। फ़िल्म की समाप्ति टैगोर के विश्व संदेश और उनके अंतिम दिनों के साथ होती है। एक घंटे से कुछ समय में राय टैगोर के चमकते पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। राय की फ़िल्म क्लासिकल स्टाइल में आगे बढ़ती है और दर्शक कुरोसावा, जेम्स आइवरी और अन्य कई प्रसिद्ध लोगों को टैगोर का गुणगान करते सुनता है। फ़िल्म कवि की महानता का गान करती चलती है।
फ़िल्म निर्देशक के नजरिए और जीवनानुभवों का निचोड़ होती है शायद इसीलिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के लिए बनाई ऋतुपर्ण घोष की टैगोर पर बनी डॉक्यूमेंट्री, ‘जीवन स्मृति’ टैगोर के जीवन में उनके अकेलेपन को उभारती है। २०१२ को अपने एक साक्षात्कार में घोष कहते हैं कि जो निकल कर आया वह था टैगोर का अकेलापन – बचपन से ले कर वृद्धावस्था तक। न तो उनके दु:ख का कोई भागीदार था और न ही उनकी सफ़लता को साझा करने वाला। यह तो एकाकी व्यक्ति की यात्रा है। वे यह भी कहते हैं कि कवि का जीवन इतना विपुल था, उसे पूरा पकड़ना संभव नहीं है। न तो राय पूरा पकड़ सके हैं न ही घोष। उनका हास्य, जीवन को हल्के ढ़ंग से लेने का उनका पक्ष तो छूट ही गया। घोष उन्हें गंभीर चिंतक और गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
रवींद्रनाथ टैगोर के ८० साल के विविधतापूर्ण जीवन से मात्र घंटे भर की सामग्री चुनना आसान काम नहीं है। यही चुनौती घोष के समक्ष भी आई जब वे २०१२ में ‘जीवन स्मृति’ बनाने चले। असल में फ़िल्म बनाने के पूर्व उनके मन में जो था वह सामग्री जुटाने के काल में काफ़ी कुछ परिवर्तित हो गया। बनने के काल में फ़िल्म खुद अपना आकार ग्रहण करने लगी और टैगोर एक एकाकी यात्री के रूप में उभर कर आए। राय और घोष दोनों पर आरोप है, इन लोगों ने टैगोर को संपूर्णता में प्रस्तुत नहीं किया। क्या यह संभव है? ‘जीवन स्मृति’ चुनी हुई स्मृतियाँ हैं। टैगोर ने स्वयं कभी अपने जीवन का तिथिवार आकलन प्रस्तुत नहीं किया है। हमारे यहाँ इसकी परम्परा भी नहीं है। पश्चिम में लोगों के जीवन के दिन-घंटों का हिसाब प्राप्त होता है। घोष कहते हैं यह फ़ोटोग्राफ़ी नहीं इम्प्रेशन है। स्वयं टैगोर ने जीवन को इम्प्रेशन के रूप में ग्रहण किया था। जब तक टैगोर ने ‘जीवन स्मृति’ (आत्मकथा नहीं) लिखी उनकी बेटियाँ, बेटा और पत्नी गुजर चुके थे। वे केवल कादम्बरी की मृत्यु के बारे में नहीं लिख रहे थे।
घोष की डॉक्यूमेंट्री में बाल कलाकार शाश्वत चैटर्जी ने बालक रवींद्रनाथ की भूमिका की है। जब वे अपनी आयु के दूसरे दशक में हैं तब की भूमिका समदर्शी ने की है। वयस्क रवींद्रनाथ का अभिनय संजय नाग मे किया है। दोनों डॉक्यूमेंट्री ऑफ़ीसियल हैं अत: इनमें विवादपूर्ण बातों से बचा गया है। लेकिन ये प्रोपेगंडा फ़िल्म नहीं हैं। राय बहुत वस्तुनिष्ठता से फ़िल्म बनाते हैं तो घोष की फ़िल्म निजी श्रद्धांजलि बन कर उपस्थित होती है। राय स्वयं एक कलाकार हैं उनकी फ़िल्म में संगीत-कला और चाक्षुष सकून है और है नाटकीय प्रस्तुतियाँ। राय ने स्क्रिप्ट लिखी, निर्देशन किया साथ ही नरेटर भी वे स्वयं हैं। कवि के गीतों का फ़िल्म में समुचित उपयोग हुआ है। डॉक्यूमेंट्री का अंत टैगोर की आवाज में, ‘मोने रेखो...’ गीत से होता है। शेक्सपीयर की भाँति टैगोर भी अपने अंतिम दिनों में अपने रचे शांतिनिकेतन छोड़ कर अपने पैतृक घर जोरासांको – जहाँ उनका बचपन बीता था – वहाँ आ गए थे। ७ अगस्त १९४१ को कविगुरु ने इस दुनिया से प्रयाण किया। यह फ़िल्म न केवल टैगोर के जीवन को दिखाती है वरन इसमें आधुनिक भारत के इतिहास की झलक भी मिलती है।
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१५ अगस्त से प्रवास
यह १५ अगस्त १९६१ का दिन था जब हम लोगों ने देवबंद छोड़ा था और जमशेदपुर के लिए चल पड़े थे। इसके पहले हम लोग उत्तर प्रदेश में ही अलग-अलग शहरों, कस्बों और गाँवों में रहते आए थे। जब पता चला हमें बिहार जाना है (उन दिनों जमशेदपुर बिहार का हिस्सा था।) तो दादी और बुआ का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। इतनी दूर बिहार जाएँगे, पता नहीं फ़िर कब देखना होगा। दादी को लगा बस अब वे अपने लल्लू (पिताजी का पुकारू नाम) को कभी नहीं देख पाएगी। भैया (वे उसे यही संबोधित करती थीं) को देखना अब शायद ही हो। उन दिनों गोरखपुर या देवबंद से जमशेदपुर आना-जाना सरल न था। गाड़ी बदलनी पड़ती थी। छपरा हो कर आना पड़ता था। असल में पिताजी को दो जॉब ऑफ़र मिले थे एक बैंगलोर से, दूसरा जमशेदपुर से। बैंगलोर जाने का सवाल ही न था। न खाना-पीना ढ़ंग का, न बोली-बानी अपनी जैसी। और दूर भी तो कितना था। सो रो-धो कर बात जमशेदपुर पर ठहरी।
पिताजी घर के बड़े लड़के, माँ के दुलारे, बहन (बहनों) के प्यारे। यू पी के सरकारी पायलेट वर्कशॉप में काम कर रहे थे। इसी सिलसिले में कभी अलीगढ़ में थे, कभी बकेवर में, तो कभी देवबंद में। जाहिर है पिताजी की शादी हो गई थी। देवबंद में माताजी-पिताजी के साथ हम पाँच भाई-बहन रह रहे थे जिसमें मुझसे छोटी बहन और एक भाई अक्सर बाबा-दादी के यहाँ गोरखपुर में रहते थे। हम लोगों की होली, दीवाली-दशहरा गोरखपुर में बीतता और जब-तब नानाजी के यहाँ बनारस में हम रहते। बनारस और गोरखपुर की बात फ़िर कभी आज तो देवबंद और जमशेदपुर की बात। सो यह १५ अगस्त का दिन था जब हम तमाम सामान के साथ लदे-फ़ंदे देवबंद के स्टेशन पर थे।
असल में एक साल पहले. १५ अगस्त, १९६० को जमशेदपुर में रीजनल इंस्ट्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी (आर आई टी) खुला था। उसके संस्थापक प्रिंसीपल डॉ. आर पी वर्मा ने पिताजी को कहीं देखा था। सो उन्होंने पिताजी को वर्कशॉप इंचार्ज के रूप में आमंत्रित किया। और उन्हें वर्कशॉप फ़ोरमैन के पद पर काम दिया। उस समय मैं सोचती थी, पिताजी चार लोगों का काम करते हैं इसीलिए वे फ़ोरमैन कहलाते हैं। उस समय कॉलेज आदित्यपुर में था जहाँ आज आयडा का ऑफ़िस है वहाँ एक आम का बागीचा था, वहीं वर्कशॉप था। और वहीं पूरी कॉलोनी के घरों में ऑफ़िस, हॉस्टल, प्रोफ़ेसर और अन्य लोगों के रहने के घर थे। गर्ल्स हॉस्टल हमारे घर के बगल में था। चार-चार घर साथ थे। सड़क के पार जहाँ आज आकाशवाणी भवन है उसका दूर-दूर तक अता-पता न था, कभी उसकी बात उस समय सोची नहीं गई थी। खड़काई नदी पर पुल बना था मगर बह गया, खंभा कमजोर था और उस पर केवल पैदल चला जा सकता था, गाड़ियाँ नहीं चल सकती थीं। नदी के बीच से एक कच्चा पुल था, वह भी काम में आता था। लोग स्टेशन या बिष्टुपुर से गाड़ी से साउथ पार्क आते अपनी गाड़ी वहीं खड़ी करते और पैदल पुल पार कर आदित्यपुर आते। कुलियों, रेजाओं (यह शब्द हमने पहली बार सुना था, यह भी जाना कि यहाँ के मजदूर पुरुष कंधे से ऊपर सिर पर सामान नहीं उठाते हैं, यह काम केवल औरतें करती हैं।) के सिर पर हमारा सामान भी घर तक पहुँचा और हम पैदल।
तो हम लोग देवबंद के छोटे-से स्टेशन पर खड़े थे, साथ में लोगों का एक हुजूम था। उस समय देवबंद एक छोटा-सा कस्बा था। सोता हुआ-सा, ऊँघता हुआ-सा। हम शाह बुल्लन की गली में रहते थे हमारे घर के पीछे बुल्ले शाह की मजार थी और घर की एक दीवार से सटा हुआ जैन मंदिर। सुबह हमें मंदिर की ओर देखना मना था क्योंकि कभी-कभी मंदिर की दीवार पर जैन साधु घूमते थे और अगर सुबह-सुबह उन्हें देख लो तो माना जाता था कि दिन बुरा गुजरेगा और उस दिन खाना तो नसीब नहीं ही होगा। गली में सड़क पार हमारी मकान मालकिन का घर था। वे अपने पटिदारों और इकलौते बेटे के साथ दुमंजिले मकान में रहती थीं। बिना पर्दे के घर से बाहर नहीं निकलती थी। पिताजी को वो अपना बड़ा बेटा मानती थी और हम उन्हें ताई जी कहा करते थे। सो, ताई जी भी हमें छोड़ने स्टेशन पर आई थीं। वर्कशॉप के छात्र, चपरासी, अन्य अधिकारी सब स्टेशन पर हम लोगों को विदा करने के लिए जमा थे। इसके पहले वर्कशॉप में पिताजी को विदाई दी जा चुकी थी जिसकी निशानी हमारे (मेरे, मेरी बहन और भाइयों) के गले में गेंदे की माला अभी भी पड़ी हुई थी। ट्रेन वहाँ बहुत कम देर खड़ी होती थी, मगर उस दिन चल नहीं पा रही थी। स्टेशन मास्टर भी हमारे साथ खड़े थे। अंत में गार्ड ने अनुरोध किया और पिताजी डिब्बे में चढ़े और ट्रेन चली। स्टेशन पर खड़े कई लोग रो रहे थे। मैं छठवीं कक्षा पास करके सातवीं में पढ़ रही थी। मुझे अपने संगी-साथियों (जिसमें कई लड़के थे, किसी लड़की की याद मुझे नहीं है) के छूटने का दु:ख था लेकिन नए शहर में जाने की खुशी और भय भी था। पिताजी से सुना था जमशेदपुर में रिक्शे वाले भी इंग्लिश बोलते हैं। बड़ी उत्सुकता थी जमशेदपुर पहुँचने की।
रेल चली। कई स्टेशन पर हमसे मिलने के लिए रिश्तेदार और पिताजी के मित्र आते रहे। एक स्टेशन पर, शायद गाज़ियाबाद पर पिताजी के एक मित्र आए जो पीतल की एक बाल्टी में भर कर खीर लाए थे। बाल्टी सहित वो हमारे लिए विदाई की सौगात थी। कानपुर में बीच वाली बुआ सपरिवार मिलने आई। पिताजी ने हमारी फ़ुफ़ेरी बहन को हमारी छोटी मेज उपहार में दे दी। डिब्बे में क्या-क्या हमारे संग चल रहा था आज आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। एक बहुत बड़े टीन के बक्स में बरतन, रजाई-गद्दों के साथ-साथ पिताजी की रैले साइकिल भी थी, जो उसी ट्रेन के सामान वाले डिब्बे में रखा था। स्टेशन पर मिलने वाले हम बच्चों को नेग देते, माताजी-पिताजी उनके बच्चों को नेग देते। यह एक, दो अथवा पाँच रुपए होते, हैसियत और रिश्ते के अनुसार। उन दिनों एक-दो रुपए बहुत बड़ी रकम होती थी। माताजी ढ़ेर सारी पोश्ते की मीठी कचौड़ी बना कर लाई थीं जो मिलने वालों को दी जाती रही और उनके लाए खाने की सामग्री हमें प्राप्त होती रही। इस तरह दो या शायद तीन दिन की यात्रा के बाद हम जमशेदपुर पहुँचे। सारे रास्ते हमने घर का बना खाना खाया, बाहर का भोजन खाना बुरा माना जाता था। ट्रेन में सहयात्रियों से हम बच्चों को खूब प्रशंसा मिल रही थी और माताजी-पिताजी से लगातार घुड़कियाँ। ट्रेन के यू पी से निकलने के बाद लोग हमारे व्यवहार, हमारे अनुशासन की खूब प्रशंसा कर रहे थे और हम बच्चों की साफ़ हिन्दी, हमारे लहजे की खूब तारीफ़ हो रही थी।
और इस तरह हम जमशेदपुर पहुँचे। जमशेदपुर में कल्चरल शॉक हमारा इंतजार कर रहा था। उस पर फ़िर कभी लिखूँगी। तब पिताजी ने कहाँ सोचा था कि यही बाकी का जीवन गुजारना होगा। सोचा था कि कुछ साल काम करेंगे फ़िर अपने यहाँ उत्तर प्रदेश लौट जाएँगे। मैंने भी कभी नहीं सोचा था, जमशेदपुर में रहूँगी। खैर तब यह भी कहाँ सोचा था कि केरल से जुड़ूँगी। हम पाँच भाई-बहन से नौ भाई-बहन हो गए (एक और बहन हो कर गुजर गई)। आर आई टी का नया कैम्पस बहुत पहले बन गया। हम वहाँ रहने नहीं गए, पुराने घर में ही रह गए। पिताजी-माताजी आज नहीं हैं। तीनों बुआ-चाचा कोई नहीं है। अब तो आर आई टी भी कहाँ है, वह तो एन आई टी बन चुका है। अब न तो वह यू पी रहा और न ही मैं वहाँ रह, बस-रच सकती हूँ। मैं ५७ साल से जमशेदपुर में हूँ। इसी शहर ने मुझे काम दिया, प्रेम दिया और इसी शहर ने मुझे पहचान दी है। अक्सर सोचती हूँ, आठ-नौ साल की दौड़ती, उछलती-कूदती अब वो लड़की कहाँ है!
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Friday, November 10, 2017
बाजार की जुगत और साहित्यिक चोरी
‘‘यदि नौजवान अपने युवा काल में बगैर मेहनत किए पैसा कमाने का विचार बना ले तो यह सर्वाधिक दुर्भाग्य का पल होता है।” – बेंजामिन फ़्रैंकलिन
बिना मेहनत के पैसा कमाने की ललक बड़े भाई को गोली मारने के लिए छोटे भाई को प्रेरित करती है। वह भी स्वयं उसके अनुसार केवल इसलिए क्योंकि बड़ा भाई उच्च पद पर था और छोटे भाई को अपने पद का फ़ायदा नहीं उठाने दे रहा था। भाई भी ऐसा जिसने पिता के मरने के बाद भाई-बहनों को पढ़ा-लिखा कर पैरों पर किया। कहाँ जा रहे हैं हम?
यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज यह दुर्भाग्य का पल सब क्षेत्रों पर छाया हुआ है। आज नौजवान बिना तिनका हिलाए धनी बनने का न केवल स्वप्न देख रहा है, विचार कर रहा है बल्कि वह यही कर भी रहा है। चाहे इसके लिए उसे साम, दाम, दंड, भेद किसी भी नीति का सहारा लेना पड़े। यहाँ तक कि लेखन जैसा कर्म भी इससे अछूता नहीं रहा है। लेखन जिसे उच्च और पवित्र माना जाता है। आज का युवा यदि लेखन के क्षेत्र में जाना चाहता है तो वहाँ भी वह त्वरित गति से, बिना मेहनत किए रातों-रात धनी बनने के स्वप्न देखता है। और प्रकाशक इसे भुनाने पर तुला हुआ है। बल्कि यूँ कहें कि प्रकाशक जो बाजारवाद का एक नुमाइंदा है, उसे यह स्वप्न दिखाता है। बाजार उसे रातों-रात धनी बनने के स्वप्न बेचता है। बाजार उसे शॉर्टकट्स के गुर सिखाता है, बाजार अपनी जुगत लगा कर उसे महत्वाकांक्षी बनाता है। वरना १७ वर्ष की काव्या विश्वनाथन को दो उपन्यास लिखने के लिए छ: संख्या वाली रकम की बड़ी पेशगी के रूप में प्रकाशक की ओर से उसे न मिलती।
शॉर्टकट्स से, बिना मेहनत किए लिखने और धन कमाने की हवस के पीछे मेधा का बाजारीकरण का हाथ है। लिखने की क्षमता, लिख कर स्वयं को अभिव्यक्त करने की इच्छा, अपनी मेधा को प्रकट करने की कामना या सत्यं, शिवं, सुंदरं को प्रदर्शित करना बहुत अच्छी बात है, बहुअत ऊँची बात है। लेकिन यह ऐसे लोगों का उद्देश्य नहीं होता है। ये लोग धन और नाम कमाने के चक्कर में लिखते हैं। पहले कवियों को राजाश्रय प्राप्त होता था। कवि रोजमर्रा की चिंताओं से मुक्त रह कर रचनाकर्म में रत रहता था। केरल के एक राज दरबार में भी ऐसे ही कवि पलते थे। केरल के राजा स्वयं भी विद्वान हुआ करते थे। एक दिन कवि दरबार लगा हुआ था, कवि अपनी-अपनी रचनाएँ सुना रहे थे और राजा स्वयं उन्हें उपहार दे रहा था। एक कवि ने अपनी रचना सुनाई। राजा ने मट्री के कान में कुछ कहा। मंत्री ने कवि को कुछ धन दिया और घोषणा की कि किसी अन्य की कविता जो आप उठा कर यहाँ तक लाए हैं, उस भार को उठाने की यह मजदूरी है। प्रश्न उठता है क्या काव्या जो स्वयं एक घनी-मानी परिवार से आती है, उसने मात्र धन प्राप्ति के लिए साहित्यिक चोरी की? कुछ लेखकों के लिए लेखन आर्थिक स्रोत का साधन हो सकता है, उनके लिए येन-केन-प्रकारेण लिखना और छपना मजबूरी है। न लिखें तो खाएँ कहाँ से। अपना और अपने परिवार का पेट कैसे पालें। उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न हो सकता है। दूसरा कोई काम वे जानते नहीं हैं। और लिखने की प्रतिभा भी उनमें नहीं है तो ऐसे लोग दूसरों के लिखे की चोरी करते हैं। तब तो यह बात समझ में आती है। हालाँकि यह भी क्षमा योग्य नहीं है। और ऐसे लोगों की चोरी जब पकड़ी जाती है – जो देर-सबेर जाती ही है – तो उनकी बड़ी छीछालेदर होती है। पर काव्या ने ऐसा क्यों किया? इसमें शक नहीं कि काव्या विश्वनाथन बाजारवाद का शिकार हुई है।
यह जीवन के प्रति कभी संतुष्ट न होने का परिणाम है। अमेरिकी जीवन शैली, जीवन दर्शन बाजार से प्रचालित, उपभोक्तावादी जीवन शैली है। अमेरिकी जीवन पद्धति भोग-विलास का दर्शन है। ‘यूज एंड थ्रो’ का दर्शन है। ऐसी जीवन शैली में व्यक्ति कभी भी संतोष का अनुभव नहीं करता है। क्योंकि संतोष किस चिड़िया का नाम है, कौन सी बला है, इसकी धारणा ऐसे लोगों को शायद नहीं होती है। एक दर्शन कहता है, ‘जब आवै संतोष धन सब धन धूलि समान’ और दूसरा दर्शन कहता है, ‘और, और, और। इस दर्शन में संतोष के लिए कोई स्थान नहीं होता है। जितना भी मिले कम है, सदा और, और के लिए भागते रहो। यह बाजार और विज्ञापन के द्वारा संचालित जीवन है। इसी धारणा ने शायद काव्या को साहित्यिक चोरी के लिए प्रेरित किया। नाम के साथ-साथ नामा भी मिलेगा। हर्र लगे न फ़िटकरी, रंग चोखा। ऐसा नहीं है कि काव्या के पास मेधा नहीं है, पर बिना मेहनत के यदि अर्थ प्राप्ति हो तो क्यों कष्ट किया जाए। यह जीवन जीने का एक भिन्न नजरिया और जीवन जीने की एक अलग प्रणाली है। बाजारवाद के सुरसा से फ़ैले मुँह में सब कुछ समाता चला जा रहा है, लेखन भी। बाजार कहता है कि व्यापारिक सफ़लता ही एकमात्र सफ़लता, एकमात्र सत्य है। इसकी चकाचौंध ने लेखकों की दृष्टि को भी प्रभावित किया है। वे व्यापारिक सफ़लता को सत्य मान बैठे हैं। साहित्य का उद्देश्य मान बैठे हैं।
आचार्य मम्मट ने अपने ने अपने ‘काव्य प्रकाश’ में काव्य प्रयोजन के विषय में अखा है, ‘काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षयते, सद्य:परिनिर्वृतये कांतासम्मितयो[अदेशयुजे’। उनके अनुसार काव्य या साहित्य का मुख्य रूप से छ: प्रयोजन है, यश प्राप्ति, धन प्राप्ति, व्यवहार में निपुणता, अकल्याण से रक्षा, आत्मानंद की प्राप्ति तथा कांता सम्मित उपदेश देना। आचार्य मम्मट के अनुसार साहित्य का एक प्रयोजन अर्थ प्राप्ति है, एकमात्र प्रयोजन नहीं। लगता है आज अधिकाँश लेखकों का उद्देश्य व्यवहार में निपुणता, अकल्याण से रक्षा, आत्मानंद की प्राप्ति तथा काम्ता सम्मित उपदेश देना नहीं है। शायद आज अधिकाँश लेखकों का साहित्य से प्रयोजान यश और धन की प्राप्ति ही अर्ह गया है। खासतौर पर उन्नत देशों के लेखकों का। हमारे यहाँ यश मिल जाए यही बहुत है। हमारे यहाँ लेखन से अर्थ प्राप्ति की बात सोचना दुराशा मात्र है। एक समय लेखक की छवि थी साधारण रहन-सहान, सादा जीवन उच्च विचार। और आज बाजार की कृपा से उसकी छवि है चमक-दमक, फ़ाइव स्टार होटल में पुस्तकों का लोकार्पण, कॉकटेल पार्टियाँ, बँगला, कार, मोबाइल। पुस्तक पर सिग्नेचर कराना चाहने वालों की भीड़। इस सब का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगता है। सोचने की बात है कि आज के बच्चे जो लेखक बनना चाहते हैं उनका रोल मॉडल कौन है?
लेखक और प्रकाशक का रिश्ता सदा से बड़ा अजीब रहा है। दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं। परंतु प्रकाशक व्यापारी है। वह व्यापाअर की तिकड़मों से बाज नहीं आता है। हाल-फ़िलहाल भारत में गगन गिल और महाश्वेता देवी तथा उनके प्रकासह्कों के कटु रिश्तों की बात सब को मालूम है। प्रकाशक लेखक को बाजार मुहैय्या कराता है। मुश्किल यह है कि प्रकाशक बाजार से जुड़ा है और वही सारी शर्तें तय करने लगता है। लेखक अपनी पाण्डुलिपि लिए एक प्रकाशक से दूसरे प्रकाशक के पास भटकता रहता है। दर-दर की ठोकरें खाता है। प्रकाशक किसी लेखक को आकाश ताक ऊँचा उठा देता है और किसी दूसरे लेखक को धूल चटवाने की कोशिश करता है। इसका एक उदाहरण हैं नैथेनियल हॉथर्न। १८२५ से १८३७ के लंबे बारह सालों में तपस्या करके उन्होंने ‘फ़ेनशॉ’ नामक एक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा पर इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें स्वयं पैसे खर्च करने पड़े। उन्होंने फ़िर ‘सेवेन टेल्स ऑफ़ माई नेटिव लैंड’ लिखा, पर प्रकाशक न मिला। हताशा इतनी बढ़ी कि सारी पांडुलिपि आग के हवाले कर दी। १८३९ में वे फ़िर ‘द जेंटल बॉय’, ‘रोजर मल्विंस बरियल’, ‘माई किंसमैन’, ‘मेजर मोलिनेक्स’ जैसी रचनाओं के प्रकाशन के लिए प्रयास कर रहे थे। लेकिन फ़िर सफ़लता न मिली। काफ़ी समय तक बेनामी रचनाएँ करते रहे। द स्टोरी टेलर’ उनकी कल्पना के चरम को दरशाती है पर यह भी संपादक की कैंची का शिकार होने के कारण अपने संपूर्ण रूप में प्रकाशित न हो सकी। बहुत बाद में जा कर उनके नाम के साथ ‘ट्वाइस टोल्ड टेल्स’ छपी। आज वे अपने उपन्यास ‘स्कारलेट लेटर’ के कारण विश्व विख्यात हैं।
इसी तरह ‘जेन एंड दि आर्ट ऑफ़ मोटर्सायकिल मेंटेनेंस’, ‘जोनार्थन लीविंग्स्टन सीगल’ के लेखकों को न मालूम कितने प्रकाशकों के दरवाजे खटल्खटाने पड़े। दूर क्यों जाएँ जब तक भैरव प्रसाद गुप्त ‘नयी कहानियाँ’ के संपादक अर्हे उन्होंने रवींद्र कालिया की कोई कहानी न छापी। स्वयं रवींद्र कालिया के अनुसार, ‘पंजाब से उनके पास अपनी दो-तीन कहानियाँ भिजवाई थीं कहानी लौटाने में उतना वक्त लगता था, जितना डाक को आने-जाने में लगता था।’ ये ही कहानियाँ क्मलेश्वर के संपादलत्व में उसी पत्रिका में प्रकाशित हुई और रवींद्र कालिया कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज खासतौर पर इंग्लिश भाषा के प्रकाशक रातों-रात सितारे खड़े करते हैं।
आज मास प्रोडक्शन का युग है। बाजार प्रत्येक वस्तु को प्रोडक्ट और पैकेजिंग की सूरत में प्रस्तुत करता है। बाजारवाद आज समाज और व्यक्ति के मानवीय मूल्यों को हजम कर रहा है। उसके सुरसा जैसे मुँह से रचनात्मक कार्य भी नहीं बचे हैं। प्रकाशक व्यापारी है वह वही माल बाजार में उतारता है जिसकी खपत संभव होती है। और आजकल प्रकाशकों के लिए विदेशों में बसे भारतीय ताग्ड़ा माल साबित हो रहे हैं। एक या दो पीढ़ी से विदेश में बसे भारतीय, जिनका एक पैर भारत में है और दूसरा में। यदि ऐसे लोग लेखक बनते हैं तो उनकी किताब की बिक्री की खूब संभावना बनती है। भारत में उनके लिए बड़ा बाजार है। और भारतीयों के विषय में जानने की उन्नत देशों में उत्सुकता के चलते ऐसे लेखकों की रचना वहाँ भी खूब बिकती है। जरूरत है तो बस ऐसे लेखन को प्रोडक्ट, एक उत्पाद्य की तरह विज्ञापित करने की। बाजार के हथकंडों को अपनाते हुए उसे बाजार में उतारने की। काव्या कि बाजार की शर्तों पर बाजार में उतारा गया है।
काव्या का केस सरासर धोखाधड़ी का मामला है। धोखाधड़ी जिसके लिए सुदर्शन अपनी कहानी ‘हार की जीत’ में कहते हैं कि इसे लोगों से न कहना, वरना लोगों का विश्वास उठ जाएगा। कौन पाठक विश्वास करेगा लेखकों पर? अब काव्या ने माफ़ी माँग ली है और मेगन मेक्कॉफ़ेर्टी – जिसकी पुस्तक से काव्या ने ज्यादा-से-ज्यादा लिया है – ने अपने विशाल हृदय का परिचय देते हुए कहा है कि वे इस पर कोई कानूनी कार्यवाही करने के पक्ष में नहीं हैं। कानूनी दाँव-पेंच में पड़ कर वे क्यों अपना समय गँवाएँ। इस समय का सदुपयोग सृजनात्मक कार्य में किया जा सकता है। पाब्लो नेरुदा अपने नोबेल भाषण में कहते हैं, ‘न तो दोषारोपण और न ही स्वयं का बचाव कवि कर्म है।’ मेगन मैक्कॉफ़र्टी ने कहा, ‘मैं किसी भी तरीके की क्षतिपूर्ति नहीं चाहती हूँ।’ मेगन ने आगे कहा, ‘मैं पुन: काम पर लगना चाहती हूँ और आगे बढ़ना चाहती हूँ और आशा करती हूँ कि मिस विश्वनाथन भी यही करेगी।’
प्रकाशक का काव्या पर काफ़ी दबाव है, वह जो भी बयान दे रही है, प्रकाशकों की सलाह और सहमति से दे रही है। प्रारंभ में काव्या ने बड़ी मासूमियत से कहा कि वह होरीफ़ाइड है, जिन अनुच्छेदों को वह सच में अपने मान रही थी वे दूसरे उपन्यास के निकले। पर ऐसा था नहीं। कोई इस झूठ का ग्राहक न निकला, उल्टे पाठक रोज-रोज मेगन के और दूसरे उपन्यासों से काव्या के उपन्यास की समानता दिखाने लगे। मात्र सत्रह वर्ष की लड़की और ऐसी होशियारी! क्या यह बचपना था? आज उन्नीस साल की काव्या रोज-रोज अपने कथन बदल रही है। झूठ के पाँव नहीं होते हैं, अंत में उसे सच स्वीकारना पड़ा। टॉल्सटॉय ने ८ वर्ष के एक बालक के साहित्यकार बनने की इच्छा प्रकट कार्ने पार उसे लिखा, ‘आपकी साहित्यकार बनने की आकांक्षा का अर्थ हुआ कि आप सांसारिक प्रख्याति-सम्मान के प्रत्याशी हैं। यह केवल आकांक्षा का अहंकार है। मनुष्य की एक ही इच्छा होनी चाहिए कि वह दयार्द्र हो, किसी को आघात न पहुँचाए, किसी से घृणा न करे। वह किसी का दोषदर्शी न हो, वरन प्रत्येक व्यक्ति के प्रति ममताग्रही हो।’
प्रकाशकों ने काव्या को बड़े ऊँचे-ऊँचे रंगीन सपने दिखाए। क्यों न युवा अमेरिकन भारतीय रातों-रात धनी बनने की ललक पालें? मार्च में १९ वर्षीय काव्या विश्वनाथन की किताब ‘हाऊ ओपल मेहता गॉट किस्ड, गॉट वाइल्ड, एंड गॉट ए लाइफ़’ की १००,००० प्रतियों का पहला संस्करण लिटिल ब्राउन एंड कंपनी से प्रकाशित हुआ और फ़टाफ़ट वह बेस्ट सेलर बन गया। और तुरंत ‘ड्रीम वर्क्स’ ने उसके ऊपर फ़िल्म बनाने के अधिकार प्राप्त कर लिए। आज के फ़ास्ट युग में यह सब चलता है। बल्कि यूँ कहें कि यही सब चलता है। काव्या हॉवर्ड यूनिवर्सिटी की छात्रा है। पिता न्यूरो सर्जन हैं और माँ स्त्री-रोग विशेषज्ञ। अमेरिका में डॉक्टर होने के मतलब आपको ज्ञात हैं। काव्या को प्रकाशकों की ओर से दो किताबें लिखने के लिए एक बहुत बड़ी रकाम ५००,००० डॉलर अग्रिम मिली है। वह अवश्य ही ऊँचे-ऊँचे ख्वाब देख रही होगी। लेकिन एक ही महीने में उसका ताश का महल ढ़ह गया।
हॉवर्ड के छात्रों की पत्रिका ‘हॉवर्ड क्रिमसन’ ने उसकी किताब और मेगन के दो उपन्यासों से सात अनुच्छेद एक जैसे खोज निकाले। मेगन किशोर-युवा साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका हैं और ‘कॉस्मोपोलिटन’ पत्रिका की पूर्व संपादक हैं। हॉर्वर्ड क्रिमसन पत्रिका ने बताया कि काव्या विश्वनाथन की किताब में मेगन की पुस्तक से गजब की समानता है। काव्या ने इसके बचाव में अत्त्काल कहा कि उसने बचपन में मेगन की किताबें पढ़ी थीं, वह उसकी फ़ैन थी। शायद अनजाने में कुछ हिस्सा उसके जेहन में बैठा रह गया, वही आ गया होगा। खबर पढ़ कर लगा कि शायद बच्ची ने यहाँ-वहाँ एकाध अनुच्छेद या एकाध कथन का प्रयोग कर लिया होगा। हालाँकि इस चोरी का इल्जाम लगने के पहलीक साक्षात्कार में पूछे जाने पर कि व्ह किस लेखक से प्रभावित है? उसने कहा था, ‘मैंने जो पढ़ा है, उसमें से किसी ने भी मुझे प्रेरित नहीं किया है।’ शीघ्र पता चला कि उसे दो किताबों के लिए आधा मिलियन डॉलर का ठेका मिला है तो लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है। फ़िर तो रोज-रोज उसके विषय में कभी कुछ तो कभी कुछ आने लगा। कहते हैं न एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। कितने दिन ऐसा चलता। जब रोज-रोज अलग-अलग लेखकों से चोरी की बात खुलने लगी, जब पाठक अनुच्छेद-के-अनुच्छेद अगल-बगल रख कर दिखाने लगे तो अंत में काव्या ने स्वीकारा कि उसने चोरी की है।
पहले दिन काव्या ने आश्चर्य जताया और यह कह कर माफ़ी माँग ली कि एक समय वह मेगन की जबरदस्त प्रशंसिका थी तथा कहा कि मुझे आश्चर्य है और मैं यह जान कर परेशान हूँ कि मेरी किताब तथा ‘स्लोपी फ़र्स्ट्स’ तथा ‘सैकेंड हेल्पिंग’ में समानता है। मुझे मालूम नहीं था कि मैंने मेगन के शब्दों को आत्मसात कर लिया है। यह पूरी तौर पर गैरइरादन और अचेतन रूप से हुआ है। और प्रकासह्कों के मार्फ़त उसने जनता, पाठक तथा लेखिका से माफ़ी माँग ली। पर बात यहीं समाप्त न हुई। कुछ ही दिनों में कुछ और पाठकों ने काव्या की किताब में कई अन्य लेखकों की पुस्तकों के अनुच्छेद ढ़ूँढ़ निकाले। इस बार नकल के उदाहरण मिले सोफ़ी किंसेला की किताब ‘कैन यू कीप अ सीक्रेट?’ तथा सल्मान रुश्दी के ‘हारोन एंड द सी ऑफ़ स्टोरीज’ एवं मेग्ग कैबोट की किताब ‘द प्रिंसेस डायरीज’ से।
इंग्लिश प्रकाशन तंत्र हिन्दी प्रकाशन से बहुत भिन्न है। वहाँ बड़े व्यावसायिक ढ़ंग से कार्य होता है। अमेरिका में लेखन और प्रकाशन दोनों व्यवसाय है और वहाँ ये दोनों भारत से बहुत अलग है। वहाँ यह काम टीम वर्क की भाँति होता है। संपादकों की एक टीम होती है जो लेखक के संग मिल कर किताब तैयार करने का काम करती है। ये संपादक अपने-अपने विषय के दिग्गज होते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य है कि क्या इनमें से किसी संपादक ने काव्या के कार्य में हुई चोरी को नहीं देखा? नहीं जाना? उन्होंने क्यों नहीं उसे सही दिशा निर्देश दिया? क्यों नहीं इस गलत काम को रोका? कहीं यह जाननूझ कर तो नहीं हुआ? आज प्रकाशन उद्योग बहुअत बड़ा व्यवसाय है, खासकर अमेरिका में। आज उपन्यास भी एक उत्पाद्य, एक पण्य वस्तु बन गया है। बाजार में यह भी एक माल है। जिसे आज के दौर में आक्रमक तरीके से ग्राहक (पाठक) को ठेला जा सकता है। यह मूलत: इंग्लिश में ही संभव है। क्योंइ यहीं पैसा है। हिन्दी, अन्य भारतीय भाषाओं या विदेशी भाषाओं में यह संभव नहीं है। विज्ञापन के युग में कुछ भी बेचा जा सकता है। पैकेजिंग महत्वपूर्ण है। कॉन्टेंट चाहे कुछ भी हो। पर जागो ग्राहक जागो का अभियान भी तेजी पर है। पाठक तो शुरु से ही जाग रहा है। पाठक एक लेखक का सबसे बड़ा न्यायधीश होता है। एक लेखक आलोचकों को धोखा दे सकता है लेकिन अपने पाठकों को नहीं। यदि कोई लेखक सोचता है कि वह पाठकों की आँख में धूल झोंक सकता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है। अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मारता है। जिन किताबों से काव्या ने अनुच्छेद उठाए थे उनके प्रकाशन के लिए माफ़ी माँगना ‘परेशान करने वाला और मक्कारी, घुन्नापन तथा कपट भरा है। क्योंकि अगले दिन चालीस अनुच्छेद को समान पाया गया। क्राउन प्रकाशन के स्टीव रोज ने इसे सीधे-सीधे साहित्यिक चोरी की संज्ञा दी। वे कानूनी कार्यवाही की बात पर विचार कर रहे हैं। अब तो काव्या के प्रकाशक, एजेंसी सबने चुप्पी साध ली है। वे न फ़ोन पर, न ई-मेल पर जवाब देते हैं। और न ही प्रश्नकर्ताओं से मिलने के लिए तैयार हैं।
यूनानी मिथक में हाइड्रा नौ सिर वाला एक भयंकर सर्प है। जो अपनी विषैली फ़ुँफ़कार से सामने वाले को नष्ट कर डालता है। जब इसका एक सिर कुचला जाता है तो उसकी जगह दो सिर उग आते हैं। अंत में इसे जला कर नष्त किया जाता है। बाजारवाद से संचालित उपभोक्तावाद हाइड्रा हेडेड मॉन्सटर है। इसके मात्र नौ सिर नहीं हैं बल्कि यह हजारों सिर वाला राक्षस है। यह एक साथ कई दिशाओं में विष वमन करता है। बाजाररूपी इस हाइड्रा को कुचलना कफ़ी नहीं है, इसे जला कर राख करना होगा। अन्यथा यह अपनी विष भरी फ़ुँफ़कार से सब नष्ट कर डालेगा। इसके सिर सपने दिखाते हैं। लालच पैदा करते हैं। इतने लुभावने, इतने रंगीन सपने दिखाते हैं कि लोग अपनी नैतिकता भूल जाते हैं। इन सपनों को पाने के लिए वे कुछ भी कर गुजरते हैं। यह व्यक्ति की महत्वकांक्षा को उकसाता है। और फ़िर बिना ज्यादा मेहनत के उन्हें पाने के शॉर्टकट्स प्रदान करता है। इसी की गिरफ़्त में आ कर कॉलेज की नवयुवतियाँ कॉल गर्ल बन जाती हैं। फ़िल्म लाइन में कॉस्टिंग काउच एक आम बात हो गई है। असल में काव्या बाजारवाद और उपभोक्तावाद दोनों का शिकार हुई है। इसमें महत्वकांक्षा का भी हाथ है जैसा कि सल्मान रुश्दी ने कहा है, ‘काव्या विश्वनाथन अपनी महत्वकांक्षा का शिकार है।’ वे नहीं मानते कि यह संयोगवश या मासूमियात से हुआ है। क्योंकि अनुच्छेद बहुतेरे हैं और समानता। यह सच में मासूमियत में नहीं हुआ है। समानता उसे बड़ी मँहगी पड़ी। माफ़ी माँगने के अगले ही दिन से प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेगन के एजेंट ने कहा, ‘यह स्वीकार करने योग्य नहीं है कि यह सब अचेतन रूप से बिना किसी बुरे इरादे के हुआ है।’ हँ, इसमें शक नहीं कि उसकी कम उम्र, उसकी मासूमियत, उसकी अनुभवहीनता को भुनाया गया है। आज वह अपनी महत्वाकांक्षा के गुंजलक में बुरी तरह फ़ँस गई है।
आज यह अमेरिका में हुआ है। अमेरिका जो हमारे युवाओं का आदर्श है, रोल मॉडल है। जिअस्की तर्ज पर आज हमारे नौजवान अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। इसकी पूरी-पूरी गुंजाइश है कि आज नहीं तो कल यह हमारे यहाँ भी हो सकता है। क्या पता हो रहा हो या शुरुआत होने वाली हो। हमें इस पर समय रहते विचार करना होगा, अंकुश लगाना होगा। इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण करना होगा। क्या यह सब इतना सरल और सीधा है? क्या यह सिर्फ़ युवा की नाम और धन कमाने की आकाश छूती माह्त्वाकांक्षा भर है? क्या उसके प्रकाशकों की इसमें कोई भूमिका नहीं है? क्या उनकी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति का इसमें कोई अशयोग नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि युवा काव्या प्रकाशकों के अनावश्यक दबाव में आ गई? या संपादकों की बात न काट सकी? प्रकाशक जो बाजार की नब्ज जानने का दावा करते हैं। युवा और नए लेखकों पर संपादकों तथा प्रकाशकों का खासा दबाव रहता है, विशेष रूप से अमेरिका में ऐसा ही है। ये युवा लेखक के मेंटर बन जाते हैं। लेखक भी अनुभवहीनता के कारण उनकी बात मानने में अपनी भलाई मानता है। उनके पास बहुत कम विकल्प होते हैं। क्या काव्या के माता-पिता की इसमें कोई भूमिका है? क्या साफ़्लता के लिए उनका दबाव था? उनके परिवार में साइंस में सबको पुरस्कार मिलते रहे हैं। क्या इसको ले कर काव्या के मन में कोई कुठा है? कहीं वह नस्लवाद के शिकार तो नहीं हुई? क्योंकि साहित्यिक चोरी धड़ल्ले से होती है। फ़िर काव्या का केस ही क्यों इतना उछला? या उछाला गया। क्या यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है?
पहले काव्या के प्रकाशक तरह-तरह के बयान दे रहे थे। और जब बात हाथ से बाहर निकलते लगी तो उन्होंने चुप्पी साध ली। प्रारंभ में काव्या के प्रकाशक का कहना था, ‘लगता है कि काव्या ने जो उधार लिया है वह उसके छात्र और लेखक होने के दबाव के कारण है।’ आज का छात्र अभिभावकों, स्कूल, साथियों सबके दबाव में रहता है। तनाव और दबाव आज के युवा के जीवन का हिस्सा है। छात्र होने के नाते इतनी बड़ी रकम ले कर सफ़ल उपन्यास लिखने का दबाव कुछ कम नहीं रहा होगा। वो स्वयं स्वीकारती है कि उपन्यास की नायिका की तरह उसके लिए भी अच्छे कॉलेज में प्रवेश एक बड़ी साम्स्या था। बल्कि उसकी अपनी कहानी ही नायिका के जीवन का कथानक बना है। हर हाल में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उपन्यास लिखते समय वह भयंकर मानसिक दबाव में थी। प्रकाशक उसे ‘१७वाँ स्ट्रीट प्रोडक्शन्स’ के लिए भी दोषी नहीं ठहरा रहे थे जिन्होंने कहानी विकसित करने में उसकी सहायता की। ‘१७वाँ स्ट्रीट प्रोडक्शन्स’ किशोरों को लेखन में सहायता प्रदान करने का कार्य करते हैं। यह एक फ़ैक्ट्री की तरह है। उनका कहना था, ‘किताब का प्रत्येक अच्छा या बुरा शब्द स्वयं उसके द्वारा लिखा गया है।’ प्रकाशक शुरु में कह रहे थे कि वर्तमान संस्करण बाजार से नहीं हटेगा। प्रारंभ में काव्या के प्रकाशक उसका बचाव करने का प्रयास कर रहे थे। पहले उन्होंने कहा कि वे शीघ्र ही अगले संस्करण में सुधार करेंगे पर जब बात आई वर्तमान संस्करण की तो उन्हें बाध्य हो कर नकल के कारण उसे बाजार से हटाना पड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने आगे के बयाना और किताब लिखने के शर्तनामे को भी खारिज कर दिया। प्रकाशक क्या समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें यह सब पता नहीं था। वे काव्या की तरह अनुभवहीन हैं। क्या वे इस तरह के बेबुनियाद बयान दे कर बच सकते हैं? रुश्दी को अफ़सोस है कि यह युवा लड़की प्रकाशान मशीन की जरूरतों द्वारा ढ़केली गई। इसमें शक नहीं कि अपनी महत्वाकांक्षा द्वारा, अपने कैरियर के प्रारंभ में काव्या इस जाल में फ़ँस गई। रुश्दी उम्मीद करते हैं कि वह इससे उबर आएगी। बाजारवाद और उपभोक्तावाद में मशीनों का बहुत बड़ा हाथ है। रुश्दी भी पर्काशन मशीन की ओर इंगित कर रहे हैं।
रचना रचनाकार के अनुभव, उसके जीवनोद्देश्य, और उसके व्यक्तित्व की छाप लिए होती है। या यूँ कहें कि उसी की प्रतिलिपि होती है। खासकार पहली रचना लगभग लेखक की जीवनी ही होती है। काव्या के अनुसार ‘हाऊ ओपल मेहता गॉट किस्ड, गॉट वाइल्ड एंड गॉट ए लाइफ़’ उसकी अपनी कहानी है। ओपल अपनी कहानी में बताती है कि वह बहुत कड़ी मेहनत कर के हाई स्कूल में सब विषय में ‘ए’ लाती है लेकिन अपनी सामाजिक जेंदगी के प्रति ध्यान नहीं देती है और इसी बिना पर उसे हॉवर्ड में प्रवेश में दिक्कत आती है। उसके पास कोई उत्तर न था जब उससे प्रवेश परीक्षा के दौरान पूछा गया कि वह मजे के लिए क्या करती है? अमेरिका में मजे करना भी एक आवश्यक काम है। क्या पता सच में उपलब्धियों के लिए काव्या के भारतीय माता-पिता का उस पर दबाव रहा हो। काव्या विश्वनाथन के माता-पिता भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं। बहुत से भारतीय अभिभावक अभी भी मानते हैं, ‘पढ़ोगे-लिखोगे होगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’। चाहे वे विदेश में रह रहे हों। येन-केन-प्रकारेण उपलब्धि पाने की ख्वाहिश बाजारवाद का हिस्सा है और विदेशों की ओर दौड़ते भारतीय इसका शिकार हैं, इसमें शायद ही किसी को शंका हो।
और तब ओपल का पिता प्रवेश परीक्षा के लिए एक योजना गढ़ता है, जिसका कूट संकेत है, ‘एच ओ डब्ल्यू जी ए एल।’ जिस तरह माता-पिता, स्कूल, साथी बच्चों पर एकेडेमिक्स में अच्छा रिजल्ट लाने के लिए दबाव बनाते हैं उसे देखते हुए याह आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। इसी का नतीजा है कि न चाहते हुए भी लाखों बच्चे आई ए एस, मेडिकल औअर इंजीनियरिंग की प्रवेश और प्रतियोगिताओं की परीक्षाओं में बैठते हैं और नाकामयाब रहने पर हताशा का शिकार होते हैं। कुछ अपनी जान ले बैठते हैं। आई आई टी तथा अन्य प्रतिशिष्ठित शिक्षा संस्थाओं में आए दिन आत्महत्याएँ होती हैं। चिकित्सा जैसा मानवीय पेशा बाजार के जाल में फ़ँस कर ऐसी गति को प्राप्त हो गया है कि इसकी प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र की खरीद-फ़रोख्त होती है। बीस लाख में प्रश्नपत्र खरीदने को अभ्यार्थी राजी हैं। बाजार ने अपने ऑक्टोपस जैसे हाथ-पैर सब दिशाओं में फ़ैला रखे हैं।
स्वतंत्रता, समानता और भाईअचारा, विश्व नागरिकता की बात करने वाले अमेरिका में रंगभेद, नस्लभेद जैसी दोहरी नीतियाँ हैं, यह जग जाहिर है। यह भी एक सत्य है कि ११ सितंबर के बाद यह और बढ गया है। कुछ थोड़े से आतंअक्वादियों ने ११ सितंबर को जो किया उसका खामियाजा मुस्लिम और एशिया के अन्य मुल्कों के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वे अमेरिका में संदिग्धता के घेरे में हैं। ऐसे में क्या काव्या का दुष्कर्म उसके साथ-साथ अन्य युवा भारतीय लेखकों की छवि पर असर नहीं डालेगा? इस चोरी का असर अन्य युवा लेखकों की छवि पर पड़ने की पूरी-पूरी संभावना है।
विकसिअत देशों के प्रकाशन जगत में एक नया चलन विकसित हुआ है। बुक पैकेजर्स प्रकाशक को प्लॉट, चरित्र, घटनाओं आदि का प्रस्ताव देते हैं और फ़िर उसके योग्य लेखक खोजते हैं। नए लेखकों के पास जाते हैं। इनके एजेंट होते हैं। ऐसी ही एक एजेंसी विलियम मोरिस ने काव्या को खोज निकाला। उन्होंने उसे ‘अलॉय एंटरप्राइजेज’ से मिलवाया। इंटरलिंकिंग का जमाना है, प्रकाशन संस्थान आपस में जुड़े हुए हैं। प्रकाशक, एजेंट, संपादक सबकी मिली भगत से काम होता है। ये सारे प्रकाशक, संपादक और पैकेजर सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। जो एडीटर आज इसके लिए काम कर रहा होता है वह कल उसके लिए काम करेगा। इसीलिए क्लॉडिया गैबल का आभार काव्या और मेगन दोनों प्रकट करती हैं। सारी घटना एक और बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है, क्या पैकेजिंग और बाजार हाइप द्वारा कुछ भी बेचा जा सकता है? दुर्भाग्यवश उत्तर सकारात्मक लगता है। लुभावने विज्ञापन और आकर्षक पैकेट में रख कर क्या कुछ नहीं बेचा जा रहा है। यहाँ तक कि लेखन भी। काव्या ने भी एक ‘बुक पैकेजर’ ‘अलॉय इंटरप्राइजेज’ के सहयोग से अपने लेखन का श्रीगणेश किया। अलॉय नए लेखकों को लिखने में सहायता देता है बदले में रॉयल्टी का कुछ प्रतिशत लेता है। इस बुक पैकेजर ने काव्या से उसके जीवन के विषय में पता किया। काव्या के जीवन में उन्हें एक गर्मागरम कहानी के प्लॉट का मसाला मिला, मसलन भारतीय अमेरिकन १७ साल की लड़की, उसके पास ब्यॉयफ़्रेंड का न होना (यह भी अमेरिकन मापादंड है), अच्छे कॉलेज में दाखिले को ले कर तनाव आदि, आदि। बस उपन्यास को आत्मकथात्मक शैली या आत्मकथा को उपन्यास शैली में प्रस्तुत करना कौन-सी बड़ी बात थी। और उन लोगों ने उसे कहानी लिखने में सहायता दी। हालाँकि लिटिल ब्राउन ने अलॉय से ही सौदा किया।
बाजार, विज्ञापन लुभावने सपने दिखाते हैं। युवा ग्लैमर और थ्रिल की दुनिया में जीना चाहता है। यह सदा से था, आज शायद प्रतिशत बढ़ गया है।कितना रोमांचक है, खासतौर पर १७-१८ वर्ष की लड़की के लिए यह सोचना, ‘यह विश्वास करना कितना कठिन है कि मैं एक बुक स्टोर में जाती हूँ और वहाँ वह प्रदर्शित किया गया है जो मैंने लिखा है।’ काव्या यह सब सोच कर उत्तेजित थी। ख्याति किसे नहीं अच्छी लगती है। वैसे भी यौवन, धान-सम्पत्ति, अविवेक और पर्भुत्व, इनमें से एक ही काफ़ी है किसी को नष्ट करने के लिए। बाजार प्रतिभा निखारने में शायद ही कोई भूमिका निभाता है। हाँ, प्रतिभा को अपनी चमक-दमक से अपनी ओर आकर्शित अवश्य करता है। अपने लाभ के लिए प्रतिभा का उपयोग या दुरुपयोग अवश्य करता है। उदाहरणस्वरूप हम देख सकते हैं कि जहाँ कोई अच्छा खिलाड़ी पैदा होता है तत्काल तमाम कंपनियाँ अपने उत्पाद्य के विज्ञापन के लिए उसे हायर कर लेती हैं। करोड़ों का लालच दे कर उसे अपना बँधुआ बना लेती हैं, फ़िर बेचारा एक उत्पाद्य बन कर रह जाता है। उसे प्रक्टिस करने, अप खेल को निखरने क सय ही नहीं मिलत है। जल्द ही उसकी प्रतिभा छीजने लगती है। खेल परिदृश्य से उसके हटते ही ये कंपनियाँ उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फ़ेंकते हैं। उनके लिए तब तक कोई और खिलाड़ी आ चुका होता है।
एक बार दार्शनिक माइकेल डममेट से किसी ने पूछा कि आइडिया कहाँ से आता है? तो उनका उत्तर था, ‘दूसरों से’। आइडिया दूसरों से लेना एक बात है लेकिन दूसरों के काम की चोरी करना बिल्कुल अलग बात है। काव्या ने साहित्यिक चोरी की है। अनय चोरियों की भाँति साहित्यिक चोरी भी अपराध है। मलयाली लेखक पोंजिक्करा रफ़ी ने सोचा भला कौन मलयाली पाठक अर्वींद्रनाथ टैगोर को पढ़ने, जानने वाला है सो उन्होंने मजे में टैगोर को मलयालम में अपने नाम से काफ़ी दिन चलाए रखा। टैगोर के ‘काबुलीवाला’ को पंजाबी लेखक सुजान सिंअ ने ‘पठान की धी’ बना दिया और वे उसके लेखक बन बैठे। पार झूठ के पाँव नहीं होते हैं वह बहुत दूर तक नहीं चल सकता है। बात जल्दी ही खुल गई। पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका ‘शंख’ ने शंख फ़ूँक दिया, इसने साहित्यिक चोरी पर विशेषांक निकाल दिया। इसी से सोचा-समझा जा सकता है कि साहित्यिक चोरी का बाजार कितना गरम है। इस पत्रिका के अनुसार आधुनिक पंजाबी के सारे-के-सारे लेखक इस घेरे में समाते हैं। चहे वे भाई वीर सिंह हों अथवा सम्मानित चर्चित पाश। पंजाबी कौम अपनी बहादुरी और अक्खड़पन के लिए प्रसिद्ध है। वे जो काम करते हैं ताल ठोंक कर करते हैं। ‘शंख’ का यह अंक इस बात की गवाही देता है कि पंजाबी लेखक साहित्यिक चोरी करता है और खुले आम करता है। पकड़े जाने पर उसे सब तरह से वाजिब सिद्ध करता है। एक पंजाबी लेखक का मानना है कि शिव कुमार बटालवी ने अपनी कविताएँ, अपने बिम्ब पेटेंट तो नहीं करवा रखे हैं। ये जनाब शब्दों को थोड़ा इधर-उधर करके शिव कुमार बटालवी की रचनाएँ अपने नाम से पेश करने का कमाल दिखाने में कुशल हैं। एक और पंजाबी कवि का कहना है, चोरी हमारी सांस की तरह, हमारे साथ जन्म लेती है। शायद ये सांस भी चोरी की लेते होंगे।
अगार गुलजार को बंगाली पत्नी (राखी) के संग ‘हिल्सा’ भी पसंद आ गई तो कोई क्या करे। लेकिन एक और बंगालन (शर्मिला टैगोर) ने उसे पकड़ लिया और मूल कहानी की फ़ोटो कॉपी ‘लिटिल मैगज़ीन’ – जहाँ गुलजार की ‘हिल्सा’ प्रकाशित हुई थी – को भेज दी। बालवंत गार्गी के सब नाटकों पर जब विदेशी चोरी का दोष लगा तो उनका उत्तर बड़ा घटिया था, ‘दूध पीने वाला चाहता है कि उसे साफ़ और शक्तिशाली दूध पीने को मिले, उसका इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए कि गाय ने किस खेत से चरा है। या फ़िर चारे के लिए कहाँ-कहाँ मुँह चलाया है।’ यह तो चोरी और सीनाजोरी हुई। इस बात से जरूर सरोकार होना चाहिए कि रचना कहां से और कैसे आ रही है। डाकू रत्नाकर के घर वाले ऐसा कह सकते हैं कि हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं हैं पर पाठक ऐसा नहीं कहेगा। उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए। लेखक रत्नाकर नहीं है क्योंकि जब रत्नाकार वाल्मीकि बन गए तब उन्होंने आदिकाव्य लिखा, साहित्यिक चोरी नहीं की। इस बात को हम मजाक में ऐसे कह सकते हैं क्योंकि यह आदिकाव्य था तो वे चोरी करते कहाँ से। हालाँ रत्नाकर और वाल्मीकि एक ही व्यक्ति थे इसका कोई सबूत नहीं है, यह तो केवल जनश्रुति है।
चौर लेखन या साहित्यिक चोरी को इंग्लिश में ‘प्लैग्यारिज्म’ कहते हैं। यह शब्द लैटिन भाषा के ‘प्लैग्यारियस’ से निकला है, जिसका अर्थ है, जो किसी और का बच्चा या गुलाम अपहरण करता है। हमारे यहाँ चौर कर्म भी एक कला माना जाता है। एक अकुशल जिसे अभ्यस द्वारा सिद्ध करना पड़ता है। पाठकों को शूद्रक के ‘मृच्क्षकटिकं’ पर आधारित संवेदनशील फ़िल्म ‘उत्सव’ का चोर और उसके चोरी करने का तरीका स्मरण होगा। नकल में भी अकल की जरूरत पड़ती है। वह नकल ही क्या जो असल न लगे। चोरी एक आम बात है। लेकिन कुछ लोग चोरी के साथ सीनाजोरी करते हैं। फ़िलम निर्देशक दीपा मेहता उनमें से एक हैं। उनकी फ़िल्म ‘वाटर’ की कहानी बांग्ला के प्रसिद्ध रचनाकार सुनिल गंगोपाध्याय की ‘सेई समय’ है। इस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। जिसे पेन्गुइन इंडिया के लिए अरुणा चक्रवर्ती ने इंग्लिश में अनुवादित किया है। शायद दीपा को छोड़ दें पर अनुवादक चोर का पीछा छोड़ने वाली नहीं है। इंद्राणी ऐकथ गिआल्टसेन, एक समय जिनकी प्रशंसा करते खुशवंत सिंह नहीं थकते थे, बाद में पता चला कि उनका ‘क्रेन्स मॉर्निंग’ पूरी तौर पर एलीबेथ गौज के ‘द रोजमेरी ट्री’ से बना है। इंद्राणी ऐकथ के पास प्रतिभा की कमी न थी। आज वे स्वयं नहीं हैं मगर उनकी बदनामी अभी भी है।
आलोचक और नेशनल बुक ट्रस्ट के पूर्व चेयरमैन सुकुमार एजीकोड के अनुसार, ‘साहित्यिक कार्य की गुणवत्ता का निर्धारण लोगों को करना चाहिए, कोर्ट को नहीं।’ वैसे एजीकोड पर दूसरों ने और उन्होंने दूसरों पर चोरी का आरोपण किया है। वे कहते हैं, ‘मैं किसी को कभी कोर्ट नहीं ले गया क्योंकि मुझे मालूम है कि मेरा काम समय की परीक्षा में खरा उतरेगा।’ लेखक पॉल ज़करिया पर भी १९वीं सदी के फ़्रांसिसी लेखक एनाटोल फ़्रांस की कहानी चोरी करने ई बात एक युवा लेखक ने कही है। चोरी का खुलासा होने पर वी नारायण जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति को अपने संपादकीय कार्य से हाथ धोना पड़ा। अरुण शौरी ने बहुत से चोर इतिहासकारों का भंडाफ़ोड़ किया है। कोई उनकी बात काटने या सफ़ाई देने आगे नहीं आ रहा है, क्योंकि सबको मालूम है कि शौरी अपना काम पक्का करते हैं। अगर उन्होंने चोरी की बात कही है तो उनके पास पक्के सबूत भी होंगे। अब साबित हो चुका है कि वाल्दीमिर नाबोकोव की ‘ललीता’ १९१६ में इसी नाम की एक जर्मन लेखक की कृति की चोरी है। उपन्यासकार बारबरा टेलर ने सहारा टीवी के खिलाफ़ केस दायर किया कि उनके उप[अन्यास ‘ए मिरेकल ऑफ़ डेस्टनी’ की नकल पर ‘करीश्मा’ सीरियल बनाया गया, बिना लेखक की जानकारी के। शायद कोप्र्ट के बाहर कुछ ले-दे कर मामला रफ़ा-दफ़ा हुआ। लेकिन यह खतार्नाक है, चोरी और कुछ ले-दे कर रफ़ा-दफ़ा करना, दोनों।
विल्सन मिंजर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, ‘यदि आप एक लेखक से चोरी करते हैं तो यह चौर लेखन है लेकिन यदि आप कई लोगों से चोरी करते हैं तो यह शोध है।’ मगर शोध में आप जिन लोगों के कार्य का उपयोग करते हैं आप उनका नाम देते हैं, उनका आभार प्रकट करते हैं। अत: इसे चोरी की संज्ञा देना उचित नहीं है। टी एस इलियट का कहना है, ‘बचकाने कच्चे कवि नकल करते हैं, महान कवि चोरी करते हैं।’ इसीलिए उन्हें भारतीय दर्शन से चोरी करने में कोई परहेज नहीं है।
कई बार साहित्यिक चोरी का इल्जाम लग जाता है, खूब हो-हल्ला होता है। बाद में सब बेबुनियाद साबित होता है। जैसा कि मलयालम के प्रसिद्ध लेखक, फ़िल्म निर्माता और ज्ञानपीठ पुरस्कृत एम टी वासुदेवन नायर के साथ हुआ। उनके ही एक दोस्त और सहकर्मी ने उनकी ही किसी हल्के-फ़ुल्के क्षण में कही बात को ले कर दावा ठोंक दिया। एम टी (वे इसी नाम से जाने जाते हैं) ने कभी अपने दोस्त केरल के प्रसिद्ध कलाकार तथा आलोचक एम वी देवन से कहा कि यदि कोई ‘न्यूयॉर्कर’ और ‘परिसन रिव्यू’ जैसे विदेशी प्रकाशन से चोरी करता है तो किसी को क्या पता चलेगा। कुछ दिन पहले एम टी पर एक प्रोफ़ेसर ने दोषारोपण किया कि उनका विख्यात उपन्यास ‘मंजु’ (इंग्लिश में ‘मिस्ट’) सीधे-सीधे हिन्दी के निर्मल वर्मा के ‘परिन्दे’ की नकल है। दोनों किताबें नैनीताल की पृष्ठभूमि पर हैं। एम टी का कहना था कि उनके पास इस बात का कोई सुराग नहीं है क्योंकि उन्होंने वर्मा के उपन्यास को कभी पढ़ा ही नहीं। बाद में निर्मल वर्मा ने स्वयं एम टी का बचाव किया क्योंकि ‘परिंदे’ का इंग्लिश अनुवाद १९६४ में ‘मंजु’ लिखे जाने के बहुत बाद में आया। वर्मा को नहीं लगता कि एम टी ने हिन्दी में इसे पढ़ा होगा। डैन ब्राउन के ‘द विंची कोड’ के संग यही हल्ला-गुल्ला हुआ। बाद में कोर्ट से इसे बरी कर दिया गया। यह माइकेल बैगेंट, रिचर्ड लीग तथा हेनरी लिंकन, लेखक त्रयी के ‘द होली ब्लड एंड द होली ग्रेल’ से प्रेरित है जिसे लेखक ने पहले ही स्वीकार किया हुआ है। अपने पूर्ववती रचनाकारों से प्रभावित हो कर लिखना एक बात अहि और चोरी करना बिल्कुल दूसरी बात है। दोनों में बुनियादी फ़र्क है।
रोज-रोज घोटालों की बात सुन-सुन कर लोग इम्यून हो गए हैं। आज बड़े-से-बड़ा घोटाला लोगों को चौंकाता नहीं है। वह अब सनसनीखेज खबर नहीं बनता है। हॉलीवुड की फ़िल्मों की फ़्रेम-दर-फ़्रेम चोरी कर बॉलीवुड में फ़िल्म बननी आम बात है। गीत-संगीत की चोरी भी बड़ी सामान्य बात हो गई है। इसे लोगों ने स्वीकार लिया है। कोई इसकी चर्चा भी नहीं करता है। पर अभी भी साहित्यिक चोरी लोगों के गले नहीं उतरती है। लेखक को समाज बहुत ऊँची दृष्टि से देखता है। समाज की उससे बहुत अपेक्षाएँ हैं। अत: जब लेखक बाजार या किसी अन्य दबाव में आ कार चोरी करता है तो पाठक को यह सरासर अन्याय लगता है। उसे लगता है कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है, उसे चीट किया गया है।
आज काव्या की किताब बाजार से उठा ली गई है। उसका लेखकीय जीवन समाप्त हो गया है। लड़की में जरूर प्रतिभा रही होगी पर प्रतिभा का ऐसा दुरुपयोग! गलती किससे नहीं होती है? सब भूल करते हैं। बचपन और जवानी में भूल होना स्वाभाविक है। एक भूल को माफ़ किया जाना चाहिए। सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। काव्या विश्वनाथन अभी बहुत कम उम्र की है। ऐसी युवा जिसमें प्रतिभा है। काव्या की नादानी को माफ़ किया जा सकता है बशर्ते वह अपनी साहित्यिक प्रतिभा का प्रदर्शन जारी रखे। प्रकाशकों के चढ़ाने से चने के झाड़ पर चढ़ने से इंकार करे। अपनी प्रतिभा को बाजारवाद की भेंट चढ़ने से बचे। यदि वह इसे अपनी भूल मानते हुए आगे अपना साहित्यिक जीवन जारी रखती है तो उसे कठिनाई आएगी अवश्य पर उसे ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता है। उसे अपना लेखन जारी रखना चाहिए। अगर उसके पास साहित्यिक गुणवत्ता होगी तो पाठक उसे अवश्य स्वीकारेगा।
अत: उसे सल्मान रुश्दी, मेगन जैसे अपने शुभचिंतकों की बात मान कर, बाकी सब भूल कर निरंतर लिखना चाहिए। हो सकता है सारे मामले से प्राप्त अनुभव ही उसके अगले लेखन का आधार बने। लेखक किसी भी अनुभव को साहित्यिक कृति में ढ़ाल सकता है। यदि उसके पास क्षमता है तो उसे चोरी करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। काव्या विश्वनाथन को कम-से-कम अब अवश्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि साहित्यकार का दायित्व लोगों को बाजारवाद के प्रति सचेत करना है, स्वयं उसका शिकार होना नहीं।
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