Tuesday, February 18, 2020

जन्मदिन की शुभकामनाएँ

जन्मदिन की शुभकामनाएँ पिताजी ! 14 Feb 2020 2003 के नोबेल पुरस्कार विजेता जॉन मैक्सवेल कट्जी अपने नोबेल प्रीतिभोज के अवसर पर बताते हैं कि पुरस्कार मिलने पर एक दिन उनकी संगिनी डोरोथी ने अचानक कहा, यदि उनकी माँ जीवित होती तो उनको कितना गर्व होता! अफ़सोस वे यह देखने को जीवित नहीं हैं! और तुम्हारे पिता! उन्हें तुम पर कितना गर्व होता! कितना ठीक कह रही थीं उनकी संगिनी। आगे वे कहते हैं कि यदि हम अपनी माँ के लिए नहीं तो आखीर किसके लिए ऐसे काम करते हैं? वे उदाहरण देते हुए कहते हैं जब हम बचपन में कोई पुरस्कार जीतते हैं तो दौड़ कर अपनी माँ को दिखाते हैं, ‘देखो मैंने यह जीता है।’ हम अपने भीतर की प्रत्येक गहन संवेदना अपनों से साझा करना चाहते हैं। चाहे वह पुलक हो अथवा भय। मिट्टी खाता बालक अपनी माँ को भी उस अनोखे स्वाद से परिचित कराना चाहता है (सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कविता) रोमांच से भरा बालक वीरबहूटी ला कर माँ को दिखाता है। दर्द तब तक कम नहीं होता है जब तक माँ चोट को फ़ूँक से उड़ा नहीं देती है। बड़े होने पर यह बालक हमारे अंदर कहीं दुबक जाता है लेकिन आह्लाद के समय, प्रसन्नता के समय यह उछल कर बाहर आ जाता है। हम अपनों के पास दौड़ कर पहुँच जाना चाहते हैं। यह सच है, हम बचपन से अपनी विजय के उल्लास में सबसे पहले अपने माता-पिता को शामिल करना चाहते हैं। पता नहीं क्यों मैं बचपन से अपनी सारी खुशिया माताजी से नहीं अपने पिताजी से बाँटना चाहती थी जबकि यह होता नहीं था। कई बार जब आप अपनी प्रसन्नता लिए जैसे किसी विषय में कक्षा में सर्वाधिक अंक पा कर आप उन्हें दिखाते हैं और वो कह दें किसी को इस विषय (उनके प्रिय विषय) में भी तो सर्वाधिक अंक मिले होंगे। और आपके सारे उत्साह पर पानी फ़िर जाए। और जब आप साहित्य पढ़ना चाहें तो वे आपको इंजीनियर बनाने पर तुले हों और घर में कई दिन तक अबोला रहे! ऐसे माता-पिता भी एक दिन आपकी सफ़लता पर गर्व करते हैं। आपके सामने भले न कहें मगर बाकी सबको आपके प्रकाशित लेख को दिखा कर बताते हों, देखिए यह मेरी बेटी का लिखा है। सबको शान से बताते हों कि उनकी बेटी कॉलेज में पढ़ाती है। आज वे कितने प्रसन्न होते जब उन्हें पता चलता कि उनकी बेटी की 19वीं पुस्तक प्रकाशित होने वाली है। भले ही मेरे सामने न कहते या शायद अब तक सामने भी कहने लगते। आज वे नहीं हैं, मगर मैं इस अवसर पर उन्हें स्मरण कर रही हूँ। आज उनका जन्मदिन है। जन्मदिन की शुभकामनाएँ पिताजी ! 000

Wednesday, August 15, 2018

फ़िल्मों में रवींद्रनाथ टैगोर

रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव न केवल बंगाल, भारत और विश्व के साहित्य पर पड़ा वरन उनका प्रभाव साहित्य के अलावा अन्य कलाओं पर भी पड़ा। एक कला जिस पर उनका सबसे अधिक प्रभाव दृष्टिगोचार होता है वह है फ़िल्म। फ़िल्म कला और विज्ञान (तकनीकि) का संगम होती है। टैगोर के काम पर दुनिया भर में करीब १०० फ़िल्में बनी हैं। इनमें से अधिकाँश रील नष्ट हो चुकी हैं। अब नेशनल फ़िल्म डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन यह काम कर रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास-कहानियों पर कई फ़िल्म निर्देशकों ने फ़िल्म बनाई हैं साथ ही रवींद्रनाथ टैगोर पर भी। हेमेन गुप्ता ने ‘काबुलीवाला’, सुधेंदु राय ने ‘समाप्ति’, तपन सिन्हा ने ‘अतिथि’, ज़ुल वेलानी तथा नागेश कुकुनूर ने ‘डाक घर’, अडुर्थी सुब्बा राव ने ‘मिलन’(‘नौका डूबी’ पर आधारित), सुमन मुखर्जी ने ‘चतुरंग’, गुलजार ने ‘लेकिन’ (‘क्षुधित पाषाण’ पर आधारित), कुमार साहनी ने ‘चार अध्याय’ बनाई। स्वयं टैगोर ने ‘नटिर पूजा’ पर एक मूक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। सत्यजित राय और ऋतुपर्ण घोष ऐसे ही दो बड़े निर्देशक हैं जिन्होंने टैगोर के काम और उनके जीवन को अपने काम का हिस्सा बनाया है। सत्यजित राय तथा ऋतुपर्ण घोष दोनों फ़िल्म निर्देशकों ने रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन और कार्य पर अलग-अलग डॉक्यूमेंट्री बनाई। लेकिन दोनों एक-दूसरे से बहुत भिन्न डॉक्यूमेंट्री हैं। सत्यजित राय रवींद्रनाथ से प्रत्यक्ष मिले थे। उनके मन में कवि की बड़ी गहरी छवि थी। उन्होंने १९६१ में ‘रबींद्रनाथ टैगोर’ नाम से श्वेत-श्याम लघु डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसमें उन्होंने रवि बाबू के जीवन और कार्य को लिया। राय रवि बाबू की आलोचना पक्ष को स्पर्श नहीं करते हैं। इस फ़िल्म की मूल पटकथा को सत्यजित राय के पुत्र संदीप राय ने अपनी किताब ‘ऑरिजनल इंग्लिश स्क्रिप्ट्स, सत्यजित राय’ में संकलित किया है। सत्यजित राय अपनी कई अन्य फ़िल्मों की भाँति इस फ़िल्म को भी अंतिम यात्रा से प्रारंभ करते हैं और तब टैगोर की वंशावलि, राजा राममोहन राय के धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक सुधार आंदोलन को प्रस्तुत करते हैं जबकि ऋतुपर्ण घोष अपनी डॉक्यूमेंट्री का आरंभ रवींद्रनाथ के बचपन से करते हैं। राय दिखाते हैं कि बचपन में टैगोर का पुकारू नाम रोबी था। फ़िल्म उनके स्कूली दिनों, उनके पिता की पत्रिका में उनकी प्रथम कविता प्रकाशन, लंदन में शिक्षा में नाकामयाबी से होती हुई उनके स्वप्न को शांतिनिकेतन में साकार होता हुआ दिखाती है। फ़िल्म में उनकी पत्नी, बच्चों की मृत्यु, उनका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा होना को प्रदर्शित करती है। इस फ़िल्म में गीतांजलि, नोबेल पुरस्कार और ‘सर’ की उपाधि की बात भी चित्रित है, और नाइटहुड लौटाने की बात भी। फ़िल्म विश्व भारती के लिए धन जुटाने के लिए किए गए विश्व भ्रमण, उनकी पेंटिंग्स तथा उनके ७०वें जन्मदिन पर प्रकाशित किताब, ‘द गोल्डन बुक ऑफ़ टैगोर’ पर भी केंद्रित होती है। टैगोर के विषय में अल्बर्ट आइन्सटीन, जगदीशचंद्र बोस, रोमेन रोलांड, महात्मा गाँधी जैसे विश्व के महान लोगों के उद्गार भी समेटे गए हैं। फ़िल्म की समाप्ति टैगोर के विश्व संदेश और उनके अंतिम दिनों के साथ होती है। एक घंटे से कुछ समय में राय टैगोर के चमकते पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। राय की फ़िल्म क्लासिकल स्टाइल में आगे बढ़ती है और दर्शक कुरोसावा, जेम्स आइवरी और अन्य कई प्रसिद्ध लोगों को टैगोर का गुणगान करते सुनता है। फ़िल्म कवि की महानता का गान करती चलती है। फ़िल्म निर्देशक के नजरिए और जीवनानुभवों का निचोड़ होती है शायद इसीलिए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के लिए बनाई ऋतुपर्ण घोष की टैगोर पर बनी डॉक्यूमेंट्री, ‘जीवन स्मृति’ टैगोर के जीवन में उनके अकेलेपन को उभारती है। २०१२ को अपने एक साक्षात्कार में घोष कहते हैं कि जो निकल कर आया वह था टैगोर का अकेलापन – बचपन से ले कर वृद्धावस्था तक। न तो उनके दु:ख का कोई भागीदार था और न ही उनकी सफ़लता को साझा करने वाला। यह तो एकाकी व्यक्ति की यात्रा है। वे यह भी कहते हैं कि कवि का जीवन इतना विपुल था, उसे पूरा पकड़ना संभव नहीं है। न तो राय पूरा पकड़ सके हैं न ही घोष। उनका हास्य, जीवन को हल्के ढ़ंग से लेने का उनका पक्ष तो छूट ही गया। घोष उन्हें गंभीर चिंतक और गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के ८० साल के विविधतापूर्ण जीवन से मात्र घंटे भर की सामग्री चुनना आसान काम नहीं है। यही चुनौती घोष के समक्ष भी आई जब वे २०१२ में ‘जीवन स्मृति’ बनाने चले। असल में फ़िल्म बनाने के पूर्व उनके मन में जो था वह सामग्री जुटाने के काल में काफ़ी कुछ परिवर्तित हो गया। बनने के काल में फ़िल्म खुद अपना आकार ग्रहण करने लगी और टैगोर एक एकाकी यात्री के रूप में उभर कर आए। राय और घोष दोनों पर आरोप है, इन लोगों ने टैगोर को संपूर्णता में प्रस्तुत नहीं किया। क्या यह संभव है? ‘जीवन स्मृति’ चुनी हुई स्मृतियाँ हैं। टैगोर ने स्वयं कभी अपने जीवन का तिथिवार आकलन प्रस्तुत नहीं किया है। हमारे यहाँ इसकी परम्परा भी नहीं है। पश्चिम में लोगों के जीवन के दिन-घंटों का हिसाब प्राप्त होता है। घोष कहते हैं यह फ़ोटोग्राफ़ी नहीं इम्प्रेशन है। स्वयं टैगोर ने जीवन को इम्प्रेशन के रूप में ग्रहण किया था। जब तक टैगोर ने ‘जीवन स्मृति’ (आत्मकथा नहीं) लिखी उनकी बेटियाँ, बेटा और पत्नी गुजर चुके थे। वे केवल कादम्बरी की मृत्यु के बारे में नहीं लिख रहे थे। घोष की डॉक्यूमेंट्री में बाल कलाकार शाश्वत चैटर्जी ने बालक रवींद्रनाथ की भूमिका की है। जब वे अपनी आयु के दूसरे दशक में हैं तब की भूमिका समदर्शी ने की है। वयस्क रवींद्रनाथ का अभिनय संजय नाग मे किया है। दोनों डॉक्यूमेंट्री ऑफ़ीसियल हैं अत: इनमें विवादपूर्ण बातों से बचा गया है। लेकिन ये प्रोपेगंडा फ़िल्म नहीं हैं। राय बहुत वस्तुनिष्ठता से फ़िल्म बनाते हैं तो घोष की फ़िल्म निजी श्रद्धांजलि बन कर उपस्थित होती है। राय स्वयं एक कलाकार हैं उनकी फ़िल्म में संगीत-कला और चाक्षुष सकून है और है नाटकीय प्रस्तुतियाँ। राय ने स्क्रिप्ट लिखी, निर्देशन किया साथ ही नरेटर भी वे स्वयं हैं। कवि के गीतों का फ़िल्म में समुचित उपयोग हुआ है। डॉक्यूमेंट्री का अंत टैगोर की आवाज में, ‘मोने रेखो...’ गीत से होता है। शेक्सपीयर की भाँति टैगोर भी अपने अंतिम दिनों में अपने रचे शांतिनिकेतन छोड़ कर अपने पैतृक घर जोरासांको – जहाँ उनका बचपन बीता था – वहाँ आ गए थे। ७ अगस्त १९४१ को कविगुरु ने इस दुनिया से प्रयाण किया। यह फ़िल्म न केवल टैगोर के जीवन को दिखाती है वरन इसमें आधुनिक भारत के इतिहास की झलक भी मिलती है। 000

१५ अगस्त से प्रवास

यह १५ अगस्त १९६१ का दिन था जब हम लोगों ने देवबंद छोड़ा था और जमशेदपुर के लिए चल पड़े थे। इसके पहले हम लोग उत्तर प्रदेश में ही अलग-अलग शहरों, कस्बों और गाँवों में रहते आए थे। जब पता चला हमें बिहार जाना है (उन दिनों जमशेदपुर बिहार का हिस्सा था।) तो दादी और बुआ का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। इतनी दूर बिहार जाएँगे, पता नहीं फ़िर कब देखना होगा। दादी को लगा बस अब वे अपने लल्लू (पिताजी का पुकारू नाम) को कभी नहीं देख पाएगी। भैया (वे उसे यही संबोधित करती थीं) को देखना अब शायद ही हो। उन दिनों गोरखपुर या देवबंद से जमशेदपुर आना-जाना सरल न था। गाड़ी बदलनी पड़ती थी। छपरा हो कर आना पड़ता था। असल में पिताजी को दो जॉब ऑफ़र मिले थे एक बैंगलोर से, दूसरा जमशेदपुर से। बैंगलोर जाने का सवाल ही न था। न खाना-पीना ढ़ंग का, न बोली-बानी अपनी जैसी। और दूर भी तो कितना था। सो रो-धो कर बात जमशेदपुर पर ठहरी। पिताजी घर के बड़े लड़के, माँ के दुलारे, बहन (बहनों) के प्यारे। यू पी के सरकारी पायलेट वर्कशॉप में काम कर रहे थे। इसी सिलसिले में कभी अलीगढ़ में थे, कभी बकेवर में, तो कभी देवबंद में। जाहिर है पिताजी की शादी हो गई थी। देवबंद में माताजी-पिताजी के साथ हम पाँच भाई-बहन रह रहे थे जिसमें मुझसे छोटी बहन और एक भाई अक्सर बाबा-दादी के यहाँ गोरखपुर में रहते थे। हम लोगों की होली, दीवाली-दशहरा गोरखपुर में बीतता और जब-तब नानाजी के यहाँ बनारस में हम रहते। बनारस और गोरखपुर की बात फ़िर कभी आज तो देवबंद और जमशेदपुर की बात। सो यह १५ अगस्त का दिन था जब हम तमाम सामान के साथ लदे-फ़ंदे देवबंद के स्टेशन पर थे। असल में एक साल पहले. १५ अगस्त, १९६० को जमशेदपुर में रीजनल इंस्ट्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी (आर आई टी) खुला था। उसके संस्थापक प्रिंसीपल डॉ. आर पी वर्मा ने पिताजी को कहीं देखा था। सो उन्होंने पिताजी को वर्कशॉप इंचार्ज के रूप में आमंत्रित किया। और उन्हें वर्कशॉप फ़ोरमैन के पद पर काम दिया। उस समय मैं सोचती थी, पिताजी चार लोगों का काम करते हैं इसीलिए वे फ़ोरमैन कहलाते हैं। उस समय कॉलेज आदित्यपुर में था जहाँ आज आयडा का ऑफ़िस है वहाँ एक आम का बागीचा था, वहीं वर्कशॉप था। और वहीं पूरी कॉलोनी के घरों में ऑफ़िस, हॉस्टल, प्रोफ़ेसर और अन्य लोगों के रहने के घर थे। गर्ल्स हॉस्टल हमारे घर के बगल में था। चार-चार घर साथ थे। सड़क के पार जहाँ आज आकाशवाणी भवन है उसका दूर-दूर तक अता-पता न था, कभी उसकी बात उस समय सोची नहीं गई थी। खड़काई नदी पर पुल बना था मगर बह गया, खंभा कमजोर था और उस पर केवल पैदल चला जा सकता था, गाड़ियाँ नहीं चल सकती थीं। नदी के बीच से एक कच्चा पुल था, वह भी काम में आता था। लोग स्टेशन या बिष्टुपुर से गाड़ी से साउथ पार्क आते अपनी गाड़ी वहीं खड़ी करते और पैदल पुल पार कर आदित्यपुर आते। कुलियों, रेजाओं (यह शब्द हमने पहली बार सुना था, यह भी जाना कि यहाँ के मजदूर पुरुष कंधे से ऊपर सिर पर सामान नहीं उठाते हैं, यह काम केवल औरतें करती हैं।) के सिर पर हमारा सामान भी घर तक पहुँचा और हम पैदल। तो हम लोग देवबंद के छोटे-से स्टेशन पर खड़े थे, साथ में लोगों का एक हुजूम था। उस समय देवबंद एक छोटा-सा कस्बा था। सोता हुआ-सा, ऊँघता हुआ-सा। हम शाह बुल्लन की गली में रहते थे हमारे घर के पीछे बुल्ले शाह की मजार थी और घर की एक दीवार से सटा हुआ जैन मंदिर। सुबह हमें मंदिर की ओर देखना मना था क्योंकि कभी-कभी मंदिर की दीवार पर जैन साधु घूमते थे और अगर सुबह-सुबह उन्हें देख लो तो माना जाता था कि दिन बुरा गुजरेगा और उस दिन खाना तो नसीब नहीं ही होगा। गली में सड़क पार हमारी मकान मालकिन का घर था। वे अपने पटिदारों और इकलौते बेटे के साथ दुमंजिले मकान में रहती थीं। बिना पर्दे के घर से बाहर नहीं निकलती थी। पिताजी को वो अपना बड़ा बेटा मानती थी और हम उन्हें ताई जी कहा करते थे। सो, ताई जी भी हमें छोड़ने स्टेशन पर आई थीं। वर्कशॉप के छात्र, चपरासी, अन्य अधिकारी सब स्टेशन पर हम लोगों को विदा करने के लिए जमा थे। इसके पहले वर्कशॉप में पिताजी को विदाई दी जा चुकी थी जिसकी निशानी हमारे (मेरे, मेरी बहन और भाइयों) के गले में गेंदे की माला अभी भी पड़ी हुई थी। ट्रेन वहाँ बहुत कम देर खड़ी होती थी, मगर उस दिन चल नहीं पा रही थी। स्टेशन मास्टर भी हमारे साथ खड़े थे। अंत में गार्ड ने अनुरोध किया और पिताजी डिब्बे में चढ़े और ट्रेन चली। स्टेशन पर खड़े कई लोग रो रहे थे। मैं छठवीं कक्षा पास करके सातवीं में पढ़ रही थी। मुझे अपने संगी-साथियों (जिसमें कई लड़के थे, किसी लड़की की याद मुझे नहीं है) के छूटने का दु:ख था लेकिन नए शहर में जाने की खुशी और भय भी था। पिताजी से सुना था जमशेदपुर में रिक्शे वाले भी इंग्लिश बोलते हैं। बड़ी उत्सुकता थी जमशेदपुर पहुँचने की। रेल चली। कई स्टेशन पर हमसे मिलने के लिए रिश्तेदार और पिताजी के मित्र आते रहे। एक स्टेशन पर, शायद गाज़ियाबाद पर पिताजी के एक मित्र आए जो पीतल की एक बाल्टी में भर कर खीर लाए थे। बाल्टी सहित वो हमारे लिए विदाई की सौगात थी। कानपुर में बीच वाली बुआ सपरिवार मिलने आई। पिताजी ने हमारी फ़ुफ़ेरी बहन को हमारी छोटी मेज उपहार में दे दी। डिब्बे में क्या-क्या हमारे संग चल रहा था आज आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। एक बहुत बड़े टीन के बक्स में बरतन, रजाई-गद्दों के साथ-साथ पिताजी की रैले साइकिल भी थी, जो उसी ट्रेन के सामान वाले डिब्बे में रखा था। स्टेशन पर मिलने वाले हम बच्चों को नेग देते, माताजी-पिताजी उनके बच्चों को नेग देते। यह एक, दो अथवा पाँच रुपए होते, हैसियत और रिश्ते के अनुसार। उन दिनों एक-दो रुपए बहुत बड़ी रकम होती थी। माताजी ढ़ेर सारी पोश्ते की मीठी कचौड़ी बना कर लाई थीं जो मिलने वालों को दी जाती रही और उनके लाए खाने की सामग्री हमें प्राप्त होती रही। इस तरह दो या शायद तीन दिन की यात्रा के बाद हम जमशेदपुर पहुँचे। सारे रास्ते हमने घर का बना खाना खाया, बाहर का भोजन खाना बुरा माना जाता था। ट्रेन में सहयात्रियों से हम बच्चों को खूब प्रशंसा मिल रही थी और माताजी-पिताजी से लगातार घुड़कियाँ। ट्रेन के यू पी से निकलने के बाद लोग हमारे व्यवहार, हमारे अनुशासन की खूब प्रशंसा कर रहे थे और हम बच्चों की साफ़ हिन्दी, हमारे लहजे की खूब तारीफ़ हो रही थी। और इस तरह हम जमशेदपुर पहुँचे। जमशेदपुर में कल्चरल शॉक हमारा इंतजार कर रहा था। उस पर फ़िर कभी लिखूँगी। तब पिताजी ने कहाँ सोचा था कि यही बाकी का जीवन गुजारना होगा। सोचा था कि कुछ साल काम करेंगे फ़िर अपने यहाँ उत्तर प्रदेश लौट जाएँगे। मैंने भी कभी नहीं सोचा था, जमशेदपुर में रहूँगी। खैर तब यह भी कहाँ सोचा था कि केरल से जुड़ूँगी। हम पाँच भाई-बहन से नौ भाई-बहन हो गए (एक और बहन हो कर गुजर गई)। आर आई टी का नया कैम्पस बहुत पहले बन गया। हम वहाँ रहने नहीं गए, पुराने घर में ही रह गए। पिताजी-माताजी आज नहीं हैं। तीनों बुआ-चाचा कोई नहीं है। अब तो आर आई टी भी कहाँ है, वह तो एन आई टी बन चुका है। अब न तो वह यू पी रहा और न ही मैं वहाँ रह, बस-रच सकती हूँ। मैं ५७ साल से जमशेदपुर में हूँ। इसी शहर ने मुझे काम दिया, प्रेम दिया और इसी शहर ने मुझे पहचान दी है। अक्सर सोचती हूँ, आठ-नौ साल की दौड़ती, उछलती-कूदती अब वो लड़की कहाँ है! ०००

Friday, November 10, 2017

बाजार की जुगत और साहित्यिक चोरी

‘‘यदि नौजवान अपने युवा काल में बगैर मेहनत किए पैसा कमाने का विचार बना ले तो यह सर्वाधिक दुर्भाग्य का पल होता है।” – बेंजामिन फ़्रैंकलिन बिना मेहनत के पैसा कमाने की ललक बड़े भाई को गोली मारने के लिए छोटे भाई को प्रेरित करती है। वह भी स्वयं उसके अनुसार केवल इसलिए क्योंकि बड़ा भाई उच्च पद पर था और छोटे भाई को अपने पद का फ़ायदा नहीं उठाने दे रहा था। भाई भी ऐसा जिसने पिता के मरने के बाद भाई-बहनों को पढ़ा-लिखा कर पैरों पर किया। कहाँ जा रहे हैं हम? यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज यह दुर्भाग्य का पल सब क्षेत्रों पर छाया हुआ है। आज नौजवान बिना तिनका हिलाए धनी बनने का न केवल स्वप्न देख रहा है, विचार कर रहा है बल्कि वह यही कर भी रहा है। चाहे इसके लिए उसे साम, दाम, दंड, भेद किसी भी नीति का सहारा लेना पड़े। यहाँ तक कि लेखन जैसा कर्म भी इससे अछूता नहीं रहा है। लेखन जिसे उच्च और पवित्र माना जाता है। आज का युवा यदि लेखन के क्षेत्र में जाना चाहता है तो वहाँ भी वह त्वरित गति से, बिना मेहनत किए रातों-रात धनी बनने के स्वप्न देखता है। और प्रकाशक इसे भुनाने पर तुला हुआ है। बल्कि यूँ कहें कि प्रकाशक जो बाजारवाद का एक नुमाइंदा है, उसे यह स्वप्न दिखाता है। बाजार उसे रातों-रात धनी बनने के स्वप्न बेचता है। बाजार उसे शॉर्टकट्स के गुर सिखाता है, बाजार अपनी जुगत लगा कर उसे महत्वाकांक्षी बनाता है। वरना १७ वर्ष की काव्या विश्वनाथन को दो उपन्यास लिखने के लिए छ: संख्या वाली रकम की बड़ी पेशगी के रूप में प्रकाशक की ओर से उसे न मिलती। शॉर्टकट्स से, बिना मेहनत किए लिखने और धन कमाने की हवस के पीछे मेधा का बाजारीकरण का हाथ है। लिखने की क्षमता, लिख कर स्वयं को अभिव्यक्त करने की इच्छा, अपनी मेधा को प्रकट करने की कामना या सत्यं, शिवं, सुंदरं को प्रदर्शित करना बहुत अच्छी बात है, बहुअत ऊँची बात है। लेकिन यह ऐसे लोगों का उद्देश्य नहीं होता है। ये लोग धन और नाम कमाने के चक्कर में लिखते हैं। पहले कवियों को राजाश्रय प्राप्त होता था। कवि रोजमर्रा की चिंताओं से मुक्त रह कर रचनाकर्म में रत रहता था। केरल के एक राज दरबार में भी ऐसे ही कवि पलते थे। केरल के राजा स्वयं भी विद्वान हुआ करते थे। एक दिन कवि दरबार लगा हुआ था, कवि अपनी-अपनी रचनाएँ सुना रहे थे और राजा स्वयं उन्हें उपहार दे रहा था। एक कवि ने अपनी रचना सुनाई। राजा ने मट्री के कान में कुछ कहा। मंत्री ने कवि को कुछ धन दिया और घोषणा की कि किसी अन्य की कविता जो आप उठा कर यहाँ तक लाए हैं, उस भार को उठाने की यह मजदूरी है। प्रश्न उठता है क्या काव्या जो स्वयं एक घनी-मानी परिवार से आती है, उसने मात्र धन प्राप्ति के लिए साहित्यिक चोरी की? कुछ लेखकों के लिए लेखन आर्थिक स्रोत का साधन हो सकता है, उनके लिए येन-केन-प्रकारेण लिखना और छपना मजबूरी है। न लिखें तो खाएँ कहाँ से। अपना और अपने परिवार का पेट कैसे पालें। उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न हो सकता है। दूसरा कोई काम वे जानते नहीं हैं। और लिखने की प्रतिभा भी उनमें नहीं है तो ऐसे लोग दूसरों के लिखे की चोरी करते हैं। तब तो यह बात समझ में आती है। हालाँकि यह भी क्षमा योग्य नहीं है। और ऐसे लोगों की चोरी जब पकड़ी जाती है – जो देर-सबेर जाती ही है – तो उनकी बड़ी छीछालेदर होती है। पर काव्या ने ऐसा क्यों किया? इसमें शक नहीं कि काव्या विश्वनाथन बाजारवाद का शिकार हुई है। यह जीवन के प्रति कभी संतुष्ट न होने का परिणाम है। अमेरिकी जीवन शैली, जीवन दर्शन बाजार से प्रचालित, उपभोक्तावादी जीवन शैली है। अमेरिकी जीवन पद्धति भोग-विलास का दर्शन है। ‘यूज एंड थ्रो’ का दर्शन है। ऐसी जीवन शैली में व्यक्ति कभी भी संतोष का अनुभव नहीं करता है। क्योंकि संतोष किस चिड़िया का नाम है, कौन सी बला है, इसकी धारणा ऐसे लोगों को शायद नहीं होती है। एक दर्शन कहता है, ‘जब आवै संतोष धन सब धन धूलि समान’ और दूसरा दर्शन कहता है, ‘और, और, और। इस दर्शन में संतोष के लिए कोई स्थान नहीं होता है। जितना भी मिले कम है, सदा और, और के लिए भागते रहो। यह बाजार और विज्ञापन के द्वारा संचालित जीवन है। इसी धारणा ने शायद काव्या को साहित्यिक चोरी के लिए प्रेरित किया। नाम के साथ-साथ नामा भी मिलेगा। हर्र लगे न फ़िटकरी, रंग चोखा। ऐसा नहीं है कि काव्या के पास मेधा नहीं है, पर बिना मेहनत के यदि अर्थ प्राप्ति हो तो क्यों कष्ट किया जाए। यह जीवन जीने का एक भिन्न नजरिया और जीवन जीने की एक अलग प्रणाली है। बाजारवाद के सुरसा से फ़ैले मुँह में सब कुछ समाता चला जा रहा है, लेखन भी। बाजार कहता है कि व्यापारिक सफ़लता ही एकमात्र सफ़लता, एकमात्र सत्य है। इसकी चकाचौंध ने लेखकों की दृष्टि को भी प्रभावित किया है। वे व्यापारिक सफ़लता को सत्य मान बैठे हैं। साहित्य का उद्देश्य मान बैठे हैं। आचार्य मम्मट ने अपने ने अपने ‘काव्य प्रकाश’ में काव्य प्रयोजन के विषय में अखा है, ‘काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षयते, सद्य:परिनिर्वृतये कांतासम्मितयो[अदेशयुजे’। उनके अनुसार काव्य या साहित्य का मुख्य रूप से छ: प्रयोजन है, यश प्राप्ति, धन प्राप्ति, व्यवहार में निपुणता, अकल्याण से रक्षा, आत्मानंद की प्राप्ति तथा कांता सम्मित उपदेश देना। आचार्य मम्मट के अनुसार साहित्य का एक प्रयोजन अर्थ प्राप्ति है, एकमात्र प्रयोजन नहीं। लगता है आज अधिकाँश लेखकों का उद्देश्य व्यवहार में निपुणता, अकल्याण से रक्षा, आत्मानंद की प्राप्ति तथा काम्ता सम्मित उपदेश देना नहीं है। शायद आज अधिकाँश लेखकों का साहित्य से प्रयोजान यश और धन की प्राप्ति ही अर्ह गया है। खासतौर पर उन्नत देशों के लेखकों का। हमारे यहाँ यश मिल जाए यही बहुत है। हमारे यहाँ लेखन से अर्थ प्राप्ति की बात सोचना दुराशा मात्र है। एक समय लेखक की छवि थी साधारण रहन-सहान, सादा जीवन उच्च विचार। और आज बाजार की कृपा से उसकी छवि है चमक-दमक, फ़ाइव स्टार होटल में पुस्तकों का लोकार्पण, कॉकटेल पार्टियाँ, बँगला, कार, मोबाइल। पुस्तक पर सिग्नेचर कराना चाहने वालों की भीड़। इस सब का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगता है। सोचने की बात है कि आज के बच्चे जो लेखक बनना चाहते हैं उनका रोल मॉडल कौन है? लेखक और प्रकाशक का रिश्ता सदा से बड़ा अजीब रहा है। दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं। परंतु प्रकाशक व्यापारी है। वह व्यापाअर की तिकड़मों से बाज नहीं आता है। हाल-फ़िलहाल भारत में गगन गिल और महाश्वेता देवी तथा उनके प्रकासह्कों के कटु रिश्तों की बात सब को मालूम है। प्रकाशक लेखक को बाजार मुहैय्या कराता है। मुश्किल यह है कि प्रकाशक बाजार से जुड़ा है और वही सारी शर्तें तय करने लगता है। लेखक अपनी पाण्डुलिपि लिए एक प्रकाशक से दूसरे प्रकाशक के पास भटकता रहता है। दर-दर की ठोकरें खाता है। प्रकाशक किसी लेखक को आकाश ताक ऊँचा उठा देता है और किसी दूसरे लेखक को धूल चटवाने की कोशिश करता है। इसका एक उदाहरण हैं नैथेनियल हॉथर्न। १८२५ से १८३७ के लंबे बारह सालों में तपस्या करके उन्होंने ‘फ़ेनशॉ’ नामक एक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा पर इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें स्वयं पैसे खर्च करने पड़े। उन्होंने फ़िर ‘सेवेन टेल्स ऑफ़ माई नेटिव लैंड’ लिखा, पर प्रकाशक न मिला। हताशा इतनी बढ़ी कि सारी पांडुलिपि आग के हवाले कर दी। १८३९ में वे फ़िर ‘द जेंटल बॉय’, ‘रोजर मल्विंस बरियल’, ‘माई किंसमैन’, ‘मेजर मोलिनेक्स’ जैसी रचनाओं के प्रकाशन के लिए प्रयास कर रहे थे। लेकिन फ़िर सफ़लता न मिली। काफ़ी समय तक बेनामी रचनाएँ करते रहे। द स्टोरी टेलर’ उनकी कल्पना के चरम को दरशाती है पर यह भी संपादक की कैंची का शिकार होने के कारण अपने संपूर्ण रूप में प्रकाशित न हो सकी। बहुत बाद में जा कर उनके नाम के साथ ‘ट्वाइस टोल्ड टेल्स’ छपी। आज वे अपने उपन्यास ‘स्कारलेट लेटर’ के कारण विश्व विख्यात हैं। इसी तरह ‘जेन एंड दि आर्ट ऑफ़ मोटर्सायकिल मेंटेनेंस’, ‘जोनार्थन लीविंग्स्टन सीगल’ के लेखकों को न मालूम कितने प्रकाशकों के दरवाजे खटल्खटाने पड़े। दूर क्यों जाएँ जब तक भैरव प्रसाद गुप्त ‘नयी कहानियाँ’ के संपादक अर्हे उन्होंने रवींद्र कालिया की कोई कहानी न छापी। स्वयं रवींद्र कालिया के अनुसार, ‘पंजाब से उनके पास अपनी दो-तीन कहानियाँ भिजवाई थीं कहानी लौटाने में उतना वक्त लगता था, जितना डाक को आने-जाने में लगता था।’ ये ही कहानियाँ क्मलेश्वर के संपादलत्व में उसी पत्रिका में प्रकाशित हुई और रवींद्र कालिया कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज खासतौर पर इंग्लिश भाषा के प्रकाशक रातों-रात सितारे खड़े करते हैं। आज मास प्रोडक्शन का युग है। बाजार प्रत्येक वस्तु को प्रोडक्ट और पैकेजिंग की सूरत में प्रस्तुत करता है। बाजारवाद आज समाज और व्यक्ति के मानवीय मूल्यों को हजम कर रहा है। उसके सुरसा जैसे मुँह से रचनात्मक कार्य भी नहीं बचे हैं। प्रकाशक व्यापारी है वह वही माल बाजार में उतारता है जिसकी खपत संभव होती है। और आजकल प्रकाशकों के लिए विदेशों में बसे भारतीय ताग्ड़ा माल साबित हो रहे हैं। एक या दो पीढ़ी से विदेश में बसे भारतीय, जिनका एक पैर भारत में है और दूसरा में। यदि ऐसे लोग लेखक बनते हैं तो उनकी किताब की बिक्री की खूब संभावना बनती है। भारत में उनके लिए बड़ा बाजार है। और भारतीयों के विषय में जानने की उन्नत देशों में उत्सुकता के चलते ऐसे लेखकों की रचना वहाँ भी खूब बिकती है। जरूरत है तो बस ऐसे लेखन को प्रोडक्ट, एक उत्पाद्य की तरह विज्ञापित करने की। बाजार के हथकंडों को अपनाते हुए उसे बाजार में उतारने की। काव्या कि बाजार की शर्तों पर बाजार में उतारा गया है। काव्या का केस सरासर धोखाधड़ी का मामला है। धोखाधड़ी जिसके लिए सुदर्शन अपनी कहानी ‘हार की जीत’ में कहते हैं कि इसे लोगों से न कहना, वरना लोगों का विश्वास उठ जाएगा। कौन पाठक विश्वास करेगा लेखकों पर? अब काव्या ने माफ़ी माँग ली है और मेगन मेक्कॉफ़ेर्टी – जिसकी पुस्तक से काव्या ने ज्यादा-से-ज्यादा लिया है – ने अपने विशाल हृदय का परिचय देते हुए कहा है कि वे इस पर कोई कानूनी कार्यवाही करने के पक्ष में नहीं हैं। कानूनी दाँव-पेंच में पड़ कर वे क्यों अपना समय गँवाएँ। इस समय का सदुपयोग सृजनात्मक कार्य में किया जा सकता है। पाब्लो नेरुदा अपने नोबेल भाषण में कहते हैं, ‘न तो दोषारोपण और न ही स्वयं का बचाव कवि कर्म है।’ मेगन मैक्कॉफ़र्टी ने कहा, ‘मैं किसी भी तरीके की क्षतिपूर्ति नहीं चाहती हूँ।’ मेगन ने आगे कहा, ‘मैं पुन: काम पर लगना चाहती हूँ और आगे बढ़ना चाहती हूँ और आशा करती हूँ कि मिस विश्वनाथन भी यही करेगी।’ प्रकाशक का काव्या पर काफ़ी दबाव है, वह जो भी बयान दे रही है, प्रकाशकों की सलाह और सहमति से दे रही है। प्रारंभ में काव्या ने बड़ी मासूमियत से कहा कि वह होरीफ़ाइड है, जिन अनुच्छेदों को वह सच में अपने मान रही थी वे दूसरे उपन्यास के निकले। पर ऐसा था नहीं। कोई इस झूठ का ग्राहक न निकला, उल्टे पाठक रोज-रोज मेगन के और दूसरे उपन्यासों से काव्या के उपन्यास की समानता दिखाने लगे। मात्र सत्रह वर्ष की लड़की और ऐसी होशियारी! क्या यह बचपना था? आज उन्नीस साल की काव्या रोज-रोज अपने कथन बदल रही है। झूठ के पाँव नहीं होते हैं, अंत में उसे सच स्वीकारना पड़ा। टॉल्सटॉय ने ८ वर्ष के एक बालक के साहित्यकार बनने की इच्छा प्रकट कार्ने पार उसे लिखा, ‘आपकी साहित्यकार बनने की आकांक्षा का अर्थ हुआ कि आप सांसारिक प्रख्याति-सम्मान के प्रत्याशी हैं। यह केवल आकांक्षा का अहंकार है। मनुष्य की एक ही इच्छा होनी चाहिए कि वह दयार्द्र हो, किसी को आघात न पहुँचाए, किसी से घृणा न करे। वह किसी का दोषदर्शी न हो, वरन प्रत्येक व्यक्ति के प्रति ममताग्रही हो।’ प्रकाशकों ने काव्या को बड़े ऊँचे-ऊँचे रंगीन सपने दिखाए। क्यों न युवा अमेरिकन भारतीय रातों-रात धनी बनने की ललक पालें? मार्च में १९ वर्षीय काव्या विश्वनाथन की किताब ‘हाऊ ओपल मेहता गॉट किस्ड, गॉट वाइल्ड, एंड गॉट ए लाइफ़’ की १००,००० प्रतियों का पहला संस्करण लिटिल ब्राउन एंड कंपनी से प्रकाशित हुआ और फ़टाफ़ट वह बेस्ट सेलर बन गया। और तुरंत ‘ड्रीम वर्क्स’ ने उसके ऊपर फ़िल्म बनाने के अधिकार प्राप्त कर लिए। आज के फ़ास्ट युग में यह सब चलता है। बल्कि यूँ कहें कि यही सब चलता है। काव्या हॉवर्ड यूनिवर्सिटी की छात्रा है। पिता न्यूरो सर्जन हैं और माँ स्त्री-रोग विशेषज्ञ। अमेरिका में डॉक्टर होने के मतलब आपको ज्ञात हैं। काव्या को प्रकाशकों की ओर से दो किताबें लिखने के लिए एक बहुत बड़ी रकाम ५००,००० डॉलर अग्रिम मिली है। वह अवश्य ही ऊँचे-ऊँचे ख्वाब देख रही होगी। लेकिन एक ही महीने में उसका ताश का महल ढ़ह गया। हॉवर्ड के छात्रों की पत्रिका ‘हॉवर्ड क्रिमसन’ ने उसकी किताब और मेगन के दो उपन्यासों से सात अनुच्छेद एक जैसे खोज निकाले। मेगन किशोर-युवा साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका हैं और ‘कॉस्मोपोलिटन’ पत्रिका की पूर्व संपादक हैं। हॉर्वर्ड क्रिमसन पत्रिका ने बताया कि काव्या विश्वनाथन की किताब में मेगन की पुस्तक से गजब की समानता है। काव्या ने इसके बचाव में अत्त्काल कहा कि उसने बचपन में मेगन की किताबें पढ़ी थीं, वह उसकी फ़ैन थी। शायद अनजाने में कुछ हिस्सा उसके जेहन में बैठा रह गया, वही आ गया होगा। खबर पढ़ कर लगा कि शायद बच्ची ने यहाँ-वहाँ एकाध अनुच्छेद या एकाध कथन का प्रयोग कर लिया होगा। हालाँकि इस चोरी का इल्जाम लगने के पहलीक साक्षात्कार में पूछे जाने पर कि व्ह किस लेखक से प्रभावित है? उसने कहा था, ‘मैंने जो पढ़ा है, उसमें से किसी ने भी मुझे प्रेरित नहीं किया है।’ शीघ्र पता चला कि उसे दो किताबों के लिए आधा मिलियन डॉलर का ठेका मिला है तो लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ है। फ़िर तो रोज-रोज उसके विषय में कभी कुछ तो कभी कुछ आने लगा। कहते हैं न एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। कितने दिन ऐसा चलता। जब रोज-रोज अलग-अलग लेखकों से चोरी की बात खुलने लगी, जब पाठक अनुच्छेद-के-अनुच्छेद अगल-बगल रख कर दिखाने लगे तो अंत में काव्या ने स्वीकारा कि उसने चोरी की है। पहले दिन काव्या ने आश्चर्य जताया और यह कह कर माफ़ी माँग ली कि एक समय वह मेगन की जबरदस्त प्रशंसिका थी तथा कहा कि मुझे आश्चर्य है और मैं यह जान कर परेशान हूँ कि मेरी किताब तथा ‘स्लोपी फ़र्स्ट्स’ तथा ‘सैकेंड हेल्पिंग’ में समानता है। मुझे मालूम नहीं था कि मैंने मेगन के शब्दों को आत्मसात कर लिया है। यह पूरी तौर पर गैरइरादन और अचेतन रूप से हुआ है। और प्रकासह्कों के मार्फ़त उसने जनता, पाठक तथा लेखिका से माफ़ी माँग ली। पर बात यहीं समाप्त न हुई। कुछ ही दिनों में कुछ और पाठकों ने काव्या की किताब में कई अन्य लेखकों की पुस्तकों के अनुच्छेद ढ़ूँढ़ निकाले। इस बार नकल के उदाहरण मिले सोफ़ी किंसेला की किताब ‘कैन यू कीप अ सीक्रेट?’ तथा सल्मान रुश्दी के ‘हारोन एंड द सी ऑफ़ स्टोरीज’ एवं मेग्ग कैबोट की किताब ‘द प्रिंसेस डायरीज’ से। इंग्लिश प्रकाशन तंत्र हिन्दी प्रकाशन से बहुत भिन्न है। वहाँ बड़े व्यावसायिक ढ़ंग से कार्य होता है। अमेरिका में लेखन और प्रकाशन दोनों व्यवसाय है और वहाँ ये दोनों भारत से बहुत अलग है। वहाँ यह काम टीम वर्क की भाँति होता है। संपादकों की एक टीम होती है जो लेखक के संग मिल कर किताब तैयार करने का काम करती है। ये संपादक अपने-अपने विषय के दिग्गज होते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य है कि क्या इनमें से किसी संपादक ने काव्या के कार्य में हुई चोरी को नहीं देखा? नहीं जाना? उन्होंने क्यों नहीं उसे सही दिशा निर्देश दिया? क्यों नहीं इस गलत काम को रोका? कहीं यह जाननूझ कर तो नहीं हुआ? आज प्रकाशन उद्योग बहुअत बड़ा व्यवसाय है, खासकर अमेरिका में। आज उपन्यास भी एक उत्पाद्य, एक पण्य वस्तु बन गया है। बाजार में यह भी एक माल है। जिसे आज के दौर में आक्रमक तरीके से ग्राहक (पाठक) को ठेला जा सकता है। यह मूलत: इंग्लिश में ही संभव है। क्योंइ यहीं पैसा है। हिन्दी, अन्य भारतीय भाषाओं या विदेशी भाषाओं में यह संभव नहीं है। विज्ञापन के युग में कुछ भी बेचा जा सकता है। पैकेजिंग महत्वपूर्ण है। कॉन्टेंट चाहे कुछ भी हो। पर जागो ग्राहक जागो का अभियान भी तेजी पर है। पाठक तो शुरु से ही जाग रहा है। पाठक एक लेखक का सबसे बड़ा न्यायधीश होता है। एक लेखक आलोचकों को धोखा दे सकता है लेकिन अपने पाठकों को नहीं। यदि कोई लेखक सोचता है कि वह पाठकों की आँख में धूल झोंक सकता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है। अपने पाँव में आप कुल्हाड़ी मारता है। जिन किताबों से काव्या ने अनुच्छेद उठाए थे उनके प्रकाशन के लिए माफ़ी माँगना ‘परेशान करने वाला और मक्कारी, घुन्नापन तथा कपट भरा है। क्योंकि अगले दिन चालीस अनुच्छेद को समान पाया गया। क्राउन प्रकाशन के स्टीव रोज ने इसे सीधे-सीधे साहित्यिक चोरी की संज्ञा दी। वे कानूनी कार्यवाही की बात पर विचार कर रहे हैं। अब तो काव्या के प्रकाशक, एजेंसी सबने चुप्पी साध ली है। वे न फ़ोन पर, न ई-मेल पर जवाब देते हैं। और न ही प्रश्नकर्ताओं से मिलने के लिए तैयार हैं। यूनानी मिथक में हाइड्रा नौ सिर वाला एक भयंकर सर्प है। जो अपनी विषैली फ़ुँफ़कार से सामने वाले को नष्ट कर डालता है। जब इसका एक सिर कुचला जाता है तो उसकी जगह दो सिर उग आते हैं। अंत में इसे जला कर नष्त किया जाता है। बाजारवाद से संचालित उपभोक्तावाद हाइड्रा हेडेड मॉन्सटर है। इसके मात्र नौ सिर नहीं हैं बल्कि यह हजारों सिर वाला राक्षस है। यह एक साथ कई दिशाओं में विष वमन करता है। बाजाररूपी इस हाइड्रा को कुचलना कफ़ी नहीं है, इसे जला कर राख करना होगा। अन्यथा यह अपनी विष भरी फ़ुँफ़कार से सब नष्ट कर डालेगा। इसके सिर सपने दिखाते हैं। लालच पैदा करते हैं। इतने लुभावने, इतने रंगीन सपने दिखाते हैं कि लोग अपनी नैतिकता भूल जाते हैं। इन सपनों को पाने के लिए वे कुछ भी कर गुजरते हैं। यह व्यक्ति की महत्वकांक्षा को उकसाता है। और फ़िर बिना ज्यादा मेहनत के उन्हें पाने के शॉर्टकट्स प्रदान करता है। इसी की गिरफ़्त में आ कर कॉलेज की नवयुवतियाँ कॉल गर्ल बन जाती हैं। फ़िल्म लाइन में कॉस्टिंग काउच एक आम बात हो गई है। असल में काव्या बाजारवाद और उपभोक्तावाद दोनों का शिकार हुई है। इसमें महत्वकांक्षा का भी हाथ है जैसा कि सल्मान रुश्दी ने कहा है, ‘काव्या विश्वनाथन अपनी महत्वकांक्षा का शिकार है।’ वे नहीं मानते कि यह संयोगवश या मासूमियात से हुआ है। क्योंकि अनुच्छेद बहुतेरे हैं और समानता। यह सच में मासूमियत में नहीं हुआ है। समानता उसे बड़ी मँहगी पड़ी। माफ़ी माँगने के अगले ही दिन से प्रतिक्रियाएँ आने लगीं। मेगन के एजेंट ने कहा, ‘यह स्वीकार करने योग्य नहीं है कि यह सब अचेतन रूप से बिना किसी बुरे इरादे के हुआ है।’ हँ, इसमें शक नहीं कि उसकी कम उम्र, उसकी मासूमियत, उसकी अनुभवहीनता को भुनाया गया है। आज वह अपनी महत्वाकांक्षा के गुंजलक में बुरी तरह फ़ँस गई है। आज यह अमेरिका में हुआ है। अमेरिका जो हमारे युवाओं का आदर्श है, रोल मॉडल है। जिअस्की तर्ज पर आज हमारे नौजवान अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। इसकी पूरी-पूरी गुंजाइश है कि आज नहीं तो कल यह हमारे यहाँ भी हो सकता है। क्या पता हो रहा हो या शुरुआत होने वाली हो। हमें इस पर समय रहते विचार करना होगा, अंकुश लगाना होगा। इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण करना होगा। क्या यह सब इतना सरल और सीधा है? क्या यह सिर्फ़ युवा की नाम और धन कमाने की आकाश छूती माह्त्वाकांक्षा भर है? क्या उसके प्रकाशकों की इसमें कोई भूमिका नहीं है? क्या उनकी इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति का इसमें कोई अशयोग नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि युवा काव्या प्रकाशकों के अनावश्यक दबाव में आ गई? या संपादकों की बात न काट सकी? प्रकाशक जो बाजार की नब्ज जानने का दावा करते हैं। युवा और नए लेखकों पर संपादकों तथा प्रकाशकों का खासा दबाव रहता है, विशेष रूप से अमेरिका में ऐसा ही है। ये युवा लेखक के मेंटर बन जाते हैं। लेखक भी अनुभवहीनता के कारण उनकी बात मानने में अपनी भलाई मानता है। उनके पास बहुत कम विकल्प होते हैं। क्या काव्या के माता-पिता की इसमें कोई भूमिका है? क्या साफ़्लता के लिए उनका दबाव था? उनके परिवार में साइंस में सबको पुरस्कार मिलते रहे हैं। क्या इसको ले कर काव्या के मन में कोई कुठा है? कहीं वह नस्लवाद के शिकार तो नहीं हुई? क्योंकि साहित्यिक चोरी धड़ल्ले से होती है। फ़िर काव्या का केस ही क्यों इतना उछला? या उछाला गया। क्या यह सब सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है? पहले काव्या के प्रकाशक तरह-तरह के बयान दे रहे थे। और जब बात हाथ से बाहर निकलते लगी तो उन्होंने चुप्पी साध ली। प्रारंभ में काव्या के प्रकाशक का कहना था, ‘लगता है कि काव्या ने जो उधार लिया है वह उसके छात्र और लेखक होने के दबाव के कारण है।’ आज का छात्र अभिभावकों, स्कूल, साथियों सबके दबाव में रहता है। तनाव और दबाव आज के युवा के जीवन का हिस्सा है। छात्र होने के नाते इतनी बड़ी रकम ले कर सफ़ल उपन्यास लिखने का दबाव कुछ कम नहीं रहा होगा। वो स्वयं स्वीकारती है कि उपन्यास की नायिका की तरह उसके लिए भी अच्छे कॉलेज में प्रवेश एक बड़ी साम्स्या था। बल्कि उसकी अपनी कहानी ही नायिका के जीवन का कथानक बना है। हर हाल में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उपन्यास लिखते समय वह भयंकर मानसिक दबाव में थी। प्रकाशक उसे ‘१७वाँ स्ट्रीट प्रोडक्शन्स’ के लिए भी दोषी नहीं ठहरा रहे थे जिन्होंने कहानी विकसित करने में उसकी सहायता की। ‘१७वाँ स्ट्रीट प्रोडक्शन्स’ किशोरों को लेखन में सहायता प्रदान करने का कार्य करते हैं। यह एक फ़ैक्ट्री की तरह है। उनका कहना था, ‘किताब का प्रत्येक अच्छा या बुरा शब्द स्वयं उसके द्वारा लिखा गया है।’ प्रकाशक शुरु में कह रहे थे कि वर्तमान संस्करण बाजार से नहीं हटेगा। प्रारंभ में काव्या के प्रकाशक उसका बचाव करने का प्रयास कर रहे थे। पहले उन्होंने कहा कि वे शीघ्र ही अगले संस्करण में सुधार करेंगे पर जब बात आई वर्तमान संस्करण की तो उन्हें बाध्य हो कर नकल के कारण उसे बाजार से हटाना पड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने आगे के बयाना और किताब लिखने के शर्तनामे को भी खारिज कर दिया। प्रकाशक क्या समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें यह सब पता नहीं था। वे काव्या की तरह अनुभवहीन हैं। क्या वे इस तरह के बेबुनियाद बयान दे कर बच सकते हैं? रुश्दी को अफ़सोस है कि यह युवा लड़की प्रकाशान मशीन की जरूरतों द्वारा ढ़केली गई। इसमें शक नहीं कि अपनी महत्वाकांक्षा द्वारा, अपने कैरियर के प्रारंभ में काव्या इस जाल में फ़ँस गई। रुश्दी उम्मीद करते हैं कि वह इससे उबर आएगी। बाजारवाद और उपभोक्तावाद में मशीनों का बहुत बड़ा हाथ है। रुश्दी भी पर्काशन मशीन की ओर इंगित कर रहे हैं। रचना रचनाकार के अनुभव, उसके जीवनोद्देश्य, और उसके व्यक्तित्व की छाप लिए होती है। या यूँ कहें कि उसी की प्रतिलिपि होती है। खासकार पहली रचना लगभग लेखक की जीवनी ही होती है। काव्या के अनुसार ‘हाऊ ओपल मेहता गॉट किस्ड, गॉट वाइल्ड एंड गॉट ए लाइफ़’ उसकी अपनी कहानी है। ओपल अपनी कहानी में बताती है कि वह बहुत कड़ी मेहनत कर के हाई स्कूल में सब विषय में ‘ए’ लाती है लेकिन अपनी सामाजिक जेंदगी के प्रति ध्यान नहीं देती है और इसी बिना पर उसे हॉवर्ड में प्रवेश में दिक्कत आती है। उसके पास कोई उत्तर न था जब उससे प्रवेश परीक्षा के दौरान पूछा गया कि वह मजे के लिए क्या करती है? अमेरिका में मजे करना भी एक आवश्यक काम है। क्या पता सच में उपलब्धियों के लिए काव्या के भारतीय माता-पिता का उस पर दबाव रहा हो। काव्या विश्वनाथन के माता-पिता भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक हैं। बहुत से भारतीय अभिभावक अभी भी मानते हैं, ‘पढ़ोगे-लिखोगे होगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’। चाहे वे विदेश में रह रहे हों। येन-केन-प्रकारेण उपलब्धि पाने की ख्वाहिश बाजारवाद का हिस्सा है और विदेशों की ओर दौड़ते भारतीय इसका शिकार हैं, इसमें शायद ही किसी को शंका हो। और तब ओपल का पिता प्रवेश परीक्षा के लिए एक योजना गढ़ता है, जिसका कूट संकेत है, ‘एच ओ डब्ल्यू जी ए एल।’ जिस तरह माता-पिता, स्कूल, साथी बच्चों पर एकेडेमिक्स में अच्छा रिजल्ट लाने के लिए दबाव बनाते हैं उसे देखते हुए याह आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। इसी का नतीजा है कि न चाहते हुए भी लाखों बच्चे आई ए एस, मेडिकल औअर इंजीनियरिंग की प्रवेश और प्रतियोगिताओं की परीक्षाओं में बैठते हैं और नाकामयाब रहने पर हताशा का शिकार होते हैं। कुछ अपनी जान ले बैठते हैं। आई आई टी तथा अन्य प्रतिशिष्ठित शिक्षा संस्थाओं में आए दिन आत्महत्याएँ होती हैं। चिकित्सा जैसा मानवीय पेशा बाजार के जाल में फ़ँस कर ऐसी गति को प्राप्त हो गया है कि इसकी प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र की खरीद-फ़रोख्त होती है। बीस लाख में प्रश्नपत्र खरीदने को अभ्यार्थी राजी हैं। बाजार ने अपने ऑक्टोपस जैसे हाथ-पैर सब दिशाओं में फ़ैला रखे हैं। स्वतंत्रता, समानता और भाईअचारा, विश्व नागरिकता की बात करने वाले अमेरिका में रंगभेद, नस्लभेद जैसी दोहरी नीतियाँ हैं, यह जग जाहिर है। यह भी एक सत्य है कि ११ सितंबर के बाद यह और बढ गया है। कुछ थोड़े से आतंअक्वादियों ने ११ सितंबर को जो किया उसका खामियाजा मुस्लिम और एशिया के अन्य मुल्कों के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वे अमेरिका में संदिग्धता के घेरे में हैं। ऐसे में क्या काव्या का दुष्कर्म उसके साथ-साथ अन्य युवा भारतीय लेखकों की छवि पर असर नहीं डालेगा? इस चोरी का असर अन्य युवा लेखकों की छवि पर पड़ने की पूरी-पूरी संभावना है। विकसिअत देशों के प्रकाशन जगत में एक नया चलन विकसित हुआ है। बुक पैकेजर्स प्रकाशक को प्लॉट, चरित्र, घटनाओं आदि का प्रस्ताव देते हैं और फ़िर उसके योग्य लेखक खोजते हैं। नए लेखकों के पास जाते हैं। इनके एजेंट होते हैं। ऐसी ही एक एजेंसी विलियम मोरिस ने काव्या को खोज निकाला। उन्होंने उसे ‘अलॉय एंटरप्राइजेज’ से मिलवाया। इंटरलिंकिंग का जमाना है, प्रकाशन संस्थान आपस में जुड़े हुए हैं। प्रकाशक, एजेंट, संपादक सबकी मिली भगत से काम होता है। ये सारे प्रकाशक, संपादक और पैकेजर सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। जो एडीटर आज इसके लिए काम कर रहा होता है वह कल उसके लिए काम करेगा। इसीलिए क्लॉडिया गैबल का आभार काव्या और मेगन दोनों प्रकट करती हैं। सारी घटना एक और बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है, क्या पैकेजिंग और बाजार हाइप द्वारा कुछ भी बेचा जा सकता है? दुर्भाग्यवश उत्तर सकारात्मक लगता है। लुभावने विज्ञापन और आकर्षक पैकेट में रख कर क्या कुछ नहीं बेचा जा रहा है। यहाँ तक कि लेखन भी। काव्या ने भी एक ‘बुक पैकेजर’ ‘अलॉय इंटरप्राइजेज’ के सहयोग से अपने लेखन का श्रीगणेश किया। अलॉय नए लेखकों को लिखने में सहायता देता है बदले में रॉयल्टी का कुछ प्रतिशत लेता है। इस बुक पैकेजर ने काव्या से उसके जीवन के विषय में पता किया। काव्या के जीवन में उन्हें एक गर्मागरम कहानी के प्लॉट का मसाला मिला, मसलन भारतीय अमेरिकन १७ साल की लड़की, उसके पास ब्यॉयफ़्रेंड का न होना (यह भी अमेरिकन मापादंड है), अच्छे कॉलेज में दाखिले को ले कर तनाव आदि, आदि। बस उपन्यास को आत्मकथात्मक शैली या आत्मकथा को उपन्यास शैली में प्रस्तुत करना कौन-सी बड़ी बात थी। और उन लोगों ने उसे कहानी लिखने में सहायता दी। हालाँकि लिटिल ब्राउन ने अलॉय से ही सौदा किया। बाजार, विज्ञापन लुभावने सपने दिखाते हैं। युवा ग्लैमर और थ्रिल की दुनिया में जीना चाहता है। यह सदा से था, आज शायद प्रतिशत बढ़ गया है।कितना रोमांचक है, खासतौर पर १७-१८ वर्ष की लड़की के लिए यह सोचना, ‘यह विश्वास करना कितना कठिन है कि मैं एक बुक स्टोर में जाती हूँ और वहाँ वह प्रदर्शित किया गया है जो मैंने लिखा है।’ काव्या यह सब सोच कर उत्तेजित थी। ख्याति किसे नहीं अच्छी लगती है। वैसे भी यौवन, धान-सम्पत्ति, अविवेक और पर्भुत्व, इनमें से एक ही काफ़ी है किसी को नष्ट करने के लिए। बाजार प्रतिभा निखारने में शायद ही कोई भूमिका निभाता है। हाँ, प्रतिभा को अपनी चमक-दमक से अपनी ओर आकर्शित अवश्य करता है। अपने लाभ के लिए प्रतिभा का उपयोग या दुरुपयोग अवश्य करता है। उदाहरणस्वरूप हम देख सकते हैं कि जहाँ कोई अच्छा खिलाड़ी पैदा होता है तत्काल तमाम कंपनियाँ अपने उत्पाद्य के विज्ञापन के लिए उसे हायर कर लेती हैं। करोड़ों का लालच दे कर उसे अपना बँधुआ बना लेती हैं, फ़िर बेचारा एक उत्पाद्य बन कर रह जाता है। उसे प्रक्टिस करने, अप खेल को निखरने क सय ही नहीं मिलत है। जल्द ही उसकी प्रतिभा छीजने लगती है। खेल परिदृश्य से उसके हटते ही ये कंपनियाँ उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फ़ेंकते हैं। उनके लिए तब तक कोई और खिलाड़ी आ चुका होता है। एक बार दार्शनिक माइकेल डममेट से किसी ने पूछा कि आइडिया कहाँ से आता है? तो उनका उत्तर था, ‘दूसरों से’। आइडिया दूसरों से लेना एक बात है लेकिन दूसरों के काम की चोरी करना बिल्कुल अलग बात है। काव्या ने साहित्यिक चोरी की है। अनय चोरियों की भाँति साहित्यिक चोरी भी अपराध है। मलयाली लेखक पोंजिक्करा रफ़ी ने सोचा भला कौन मलयाली पाठक अर्वींद्रनाथ टैगोर को पढ़ने, जानने वाला है सो उन्होंने मजे में टैगोर को मलयालम में अपने नाम से काफ़ी दिन चलाए रखा। टैगोर के ‘काबुलीवाला’ को पंजाबी लेखक सुजान सिंअ ने ‘पठान की धी’ बना दिया और वे उसके लेखक बन बैठे। पार झूठ के पाँव नहीं होते हैं वह बहुत दूर तक नहीं चल सकता है। बात जल्दी ही खुल गई। पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका ‘शंख’ ने शंख फ़ूँक दिया, इसने साहित्यिक चोरी पर विशेषांक निकाल दिया। इसी से सोचा-समझा जा सकता है कि साहित्यिक चोरी का बाजार कितना गरम है। इस पत्रिका के अनुसार आधुनिक पंजाबी के सारे-के-सारे लेखक इस घेरे में समाते हैं। चहे वे भाई वीर सिंह हों अथवा सम्मानित चर्चित पाश। पंजाबी कौम अपनी बहादुरी और अक्खड़पन के लिए प्रसिद्ध है। वे जो काम करते हैं ताल ठोंक कर करते हैं। ‘शंख’ का यह अंक इस बात की गवाही देता है कि पंजाबी लेखक साहित्यिक चोरी करता है और खुले आम करता है। पकड़े जाने पर उसे सब तरह से वाजिब सिद्ध करता है। एक पंजाबी लेखक का मानना है कि शिव कुमार बटालवी ने अपनी कविताएँ, अपने बिम्ब पेटेंट तो नहीं करवा रखे हैं। ये जनाब शब्दों को थोड़ा इधर-उधर करके शिव कुमार बटालवी की रचनाएँ अपने नाम से पेश करने का कमाल दिखाने में कुशल हैं। एक और पंजाबी कवि का कहना है, चोरी हमारी सांस की तरह, हमारे साथ जन्म लेती है। शायद ये सांस भी चोरी की लेते होंगे। अगार गुलजार को बंगाली पत्नी (राखी) के संग ‘हिल्सा’ भी पसंद आ गई तो कोई क्या करे। लेकिन एक और बंगालन (शर्मिला टैगोर) ने उसे पकड़ लिया और मूल कहानी की फ़ोटो कॉपी ‘लिटिल मैगज़ीन’ – जहाँ गुलजार की ‘हिल्सा’ प्रकाशित हुई थी – को भेज दी। बालवंत गार्गी के सब नाटकों पर जब विदेशी चोरी का दोष लगा तो उनका उत्तर बड़ा घटिया था, ‘दूध पीने वाला चाहता है कि उसे साफ़ और शक्तिशाली दूध पीने को मिले, उसका इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए कि गाय ने किस खेत से चरा है। या फ़िर चारे के लिए कहाँ-कहाँ मुँह चलाया है।’ यह तो चोरी और सीनाजोरी हुई। इस बात से जरूर सरोकार होना चाहिए कि रचना कहां से और कैसे आ रही है। डाकू रत्नाकर के घर वाले ऐसा कह सकते हैं कि हम तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं हैं पर पाठक ऐसा नहीं कहेगा। उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए। लेखक रत्नाकर नहीं है क्योंकि जब रत्नाकार वाल्मीकि बन गए तब उन्होंने आदिकाव्य लिखा, साहित्यिक चोरी नहीं की। इस बात को हम मजाक में ऐसे कह सकते हैं क्योंकि यह आदिकाव्य था तो वे चोरी करते कहाँ से। हालाँ रत्नाकर और वाल्मीकि एक ही व्यक्ति थे इसका कोई सबूत नहीं है, यह तो केवल जनश्रुति है। चौर लेखन या साहित्यिक चोरी को इंग्लिश में ‘प्लैग्यारिज्म’ कहते हैं। यह शब्द लैटिन भाषा के ‘प्लैग्यारियस’ से निकला है, जिसका अर्थ है, जो किसी और का बच्चा या गुलाम अपहरण करता है। हमारे यहाँ चौर कर्म भी एक कला माना जाता है। एक अकुशल जिसे अभ्यस द्वारा सिद्ध करना पड़ता है। पाठकों को शूद्रक के ‘मृच्क्षकटिकं’ पर आधारित संवेदनशील फ़िल्म ‘उत्सव’ का चोर और उसके चोरी करने का तरीका स्मरण होगा। नकल में भी अकल की जरूरत पड़ती है। वह नकल ही क्या जो असल न लगे। चोरी एक आम बात है। लेकिन कुछ लोग चोरी के साथ सीनाजोरी करते हैं। फ़िलम निर्देशक दीपा मेहता उनमें से एक हैं। उनकी फ़िल्म ‘वाटर’ की कहानी बांग्ला के प्रसिद्ध रचनाकार सुनिल गंगोपाध्याय की ‘सेई समय’ है। इस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। जिसे पेन्गुइन इंडिया के लिए अरुणा चक्रवर्ती ने इंग्लिश में अनुवादित किया है। शायद दीपा को छोड़ दें पर अनुवादक चोर का पीछा छोड़ने वाली नहीं है। इंद्राणी ऐकथ गिआल्टसेन, एक समय जिनकी प्रशंसा करते खुशवंत सिंह नहीं थकते थे, बाद में पता चला कि उनका ‘क्रेन्स मॉर्निंग’ पूरी तौर पर एलीबेथ गौज के ‘द रोजमेरी ट्री’ से बना है। इंद्राणी ऐकथ के पास प्रतिभा की कमी न थी। आज वे स्वयं नहीं हैं मगर उनकी बदनामी अभी भी है। आलोचक और नेशनल बुक ट्रस्ट के पूर्व चेयरमैन सुकुमार एजीकोड के अनुसार, ‘साहित्यिक कार्य की गुणवत्ता का निर्धारण लोगों को करना चाहिए, कोर्ट को नहीं।’ वैसे एजीकोड पर दूसरों ने और उन्होंने दूसरों पर चोरी का आरोपण किया है। वे कहते हैं, ‘मैं किसी को कभी कोर्ट नहीं ले गया क्योंकि मुझे मालूम है कि मेरा काम समय की परीक्षा में खरा उतरेगा।’ लेखक पॉल ज़करिया पर भी १९वीं सदी के फ़्रांसिसी लेखक एनाटोल फ़्रांस की कहानी चोरी करने ई बात एक युवा लेखक ने कही है। चोरी का खुलासा होने पर वी नारायण जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति को अपने संपादकीय कार्य से हाथ धोना पड़ा। अरुण शौरी ने बहुत से चोर इतिहासकारों का भंडाफ़ोड़ किया है। कोई उनकी बात काटने या सफ़ाई देने आगे नहीं आ रहा है, क्योंकि सबको मालूम है कि शौरी अपना काम पक्का करते हैं। अगर उन्होंने चोरी की बात कही है तो उनके पास पक्के सबूत भी होंगे। अब साबित हो चुका है कि वाल्दीमिर नाबोकोव की ‘ललीता’ १९१६ में इसी नाम की एक जर्मन लेखक की कृति की चोरी है। उपन्यासकार बारबरा टेलर ने सहारा टीवी के खिलाफ़ केस दायर किया कि उनके उप[अन्यास ‘ए मिरेकल ऑफ़ डेस्टनी’ की नकल पर ‘करीश्मा’ सीरियल बनाया गया, बिना लेखक की जानकारी के। शायद कोप्र्ट के बाहर कुछ ले-दे कर मामला रफ़ा-दफ़ा हुआ। लेकिन यह खतार्नाक है, चोरी और कुछ ले-दे कर रफ़ा-दफ़ा करना, दोनों। विल्सन मिंजर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, ‘यदि आप एक लेखक से चोरी करते हैं तो यह चौर लेखन है लेकिन यदि आप कई लोगों से चोरी करते हैं तो यह शोध है।’ मगर शोध में आप जिन लोगों के कार्य का उपयोग करते हैं आप उनका नाम देते हैं, उनका आभार प्रकट करते हैं। अत: इसे चोरी की संज्ञा देना उचित नहीं है। टी एस इलियट का कहना है, ‘बचकाने कच्चे कवि नकल करते हैं, महान कवि चोरी करते हैं।’ इसीलिए उन्हें भारतीय दर्शन से चोरी करने में कोई परहेज नहीं है। कई बार साहित्यिक चोरी का इल्जाम लग जाता है, खूब हो-हल्ला होता है। बाद में सब बेबुनियाद साबित होता है। जैसा कि मलयालम के प्रसिद्ध लेखक, फ़िल्म निर्माता और ज्ञानपीठ पुरस्कृत एम टी वासुदेवन नायर के साथ हुआ। उनके ही एक दोस्त और सहकर्मी ने उनकी ही किसी हल्के-फ़ुल्के क्षण में कही बात को ले कर दावा ठोंक दिया। एम टी (वे इसी नाम से जाने जाते हैं) ने कभी अपने दोस्त केरल के प्रसिद्ध कलाकार तथा आलोचक एम वी देवन से कहा कि यदि कोई ‘न्यूयॉर्कर’ और ‘परिसन रिव्यू’ जैसे विदेशी प्रकाशन से चोरी करता है तो किसी को क्या पता चलेगा। कुछ दिन पहले एम टी पर एक प्रोफ़ेसर ने दोषारोपण किया कि उनका विख्यात उपन्यास ‘मंजु’ (इंग्लिश में ‘मिस्ट’) सीधे-सीधे हिन्दी के निर्मल वर्मा के ‘परिन्दे’ की नकल है। दोनों किताबें नैनीताल की पृष्ठभूमि पर हैं। एम टी का कहना था कि उनके पास इस बात का कोई सुराग नहीं है क्योंकि उन्होंने वर्मा के उपन्यास को कभी पढ़ा ही नहीं। बाद में निर्मल वर्मा ने स्वयं एम टी का बचाव किया क्योंकि ‘परिंदे’ का इंग्लिश अनुवाद १९६४ में ‘मंजु’ लिखे जाने के बहुत बाद में आया। वर्मा को नहीं लगता कि एम टी ने हिन्दी में इसे पढ़ा होगा। डैन ब्राउन के ‘द विंची कोड’ के संग यही हल्ला-गुल्ला हुआ। बाद में कोर्ट से इसे बरी कर दिया गया। यह माइकेल बैगेंट, रिचर्ड लीग तथा हेनरी लिंकन, लेखक त्रयी के ‘द होली ब्लड एंड द होली ग्रेल’ से प्रेरित है जिसे लेखक ने पहले ही स्वीकार किया हुआ है। अपने पूर्ववती रचनाकारों से प्रभावित हो कर लिखना एक बात अहि और चोरी करना बिल्कुल दूसरी बात है। दोनों में बुनियादी फ़र्क है। रोज-रोज घोटालों की बात सुन-सुन कर लोग इम्यून हो गए हैं। आज बड़े-से-बड़ा घोटाला लोगों को चौंकाता नहीं है। वह अब सनसनीखेज खबर नहीं बनता है। हॉलीवुड की फ़िल्मों की फ़्रेम-दर-फ़्रेम चोरी कर बॉलीवुड में फ़िल्म बननी आम बात है। गीत-संगीत की चोरी भी बड़ी सामान्य बात हो गई है। इसे लोगों ने स्वीकार लिया है। कोई इसकी चर्चा भी नहीं करता है। पर अभी भी साहित्यिक चोरी लोगों के गले नहीं उतरती है। लेखक को समाज बहुत ऊँची दृष्टि से देखता है। समाज की उससे बहुत अपेक्षाएँ हैं। अत: जब लेखक बाजार या किसी अन्य दबाव में आ कार चोरी करता है तो पाठक को यह सरासर अन्याय लगता है। उसे लगता है कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है, उसे चीट किया गया है। आज काव्या की किताब बाजार से उठा ली गई है। उसका लेखकीय जीवन समाप्त हो गया है। लड़की में जरूर प्रतिभा रही होगी पर प्रतिभा का ऐसा दुरुपयोग! गलती किससे नहीं होती है? सब भूल करते हैं। बचपन और जवानी में भूल होना स्वाभाविक है। एक भूल को माफ़ किया जाना चाहिए। सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। काव्या विश्वनाथन अभी बहुत कम उम्र की है। ऐसी युवा जिसमें प्रतिभा है। काव्या की नादानी को माफ़ किया जा सकता है बशर्ते वह अपनी साहित्यिक प्रतिभा का प्रदर्शन जारी रखे। प्रकाशकों के चढ़ाने से चने के झाड़ पर चढ़ने से इंकार करे। अपनी प्रतिभा को बाजारवाद की भेंट चढ़ने से बचे। यदि वह इसे अपनी भूल मानते हुए आगे अपना साहित्यिक जीवन जारी रखती है तो उसे कठिनाई आएगी अवश्य पर उसे ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता है। उसे अपना लेखन जारी रखना चाहिए। अगर उसके पास साहित्यिक गुणवत्ता होगी तो पाठक उसे अवश्य स्वीकारेगा। अत: उसे सल्मान रुश्दी, मेगन जैसे अपने शुभचिंतकों की बात मान कर, बाकी सब भूल कर निरंतर लिखना चाहिए। हो सकता है सारे मामले से प्राप्त अनुभव ही उसके अगले लेखन का आधार बने। लेखक किसी भी अनुभव को साहित्यिक कृति में ढ़ाल सकता है। यदि उसके पास क्षमता है तो उसे चोरी करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। काव्या विश्वनाथन को कम-से-कम अब अवश्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि साहित्यकार का दायित्व लोगों को बाजारवाद के प्रति सचेत करना है, स्वयं उसका शिकार होना नहीं। ०००

Tuesday, August 16, 2016

अमृतलाल नागर पत्रों में

यह अमृतलाल नागर का जन्मशती वर्ष है। साथ-ही-साथ उनके उपन्यास ‘अमृत और विष’ की अर्धशती भी है। अमृतलाल नागर का जन्म १७ अगस्त १०१६ को आगरा के गोकुलपुरा नामक स्थान में हुआ था। वे बीसवीं शताब्दि के हिन्दी के एक बहुत बड़े कद के लेखक थे। उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, यात्रा वृतांत, संस्मरण, फ़िल्म स्क्रिप्ट, जीवनी, हास्य-व्यंग्य, अनुवाद आदि विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा, प्रेमचंद पुरस्‍कार, सेवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार, मध्‍य प्रदेश शासन साहित्‍य परिषद पुरस्कार, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्‍कार, भारतीय भाषा पुरस्कार, नथमल भुवालका पुरस्‍कार, भारत भारती सम्‍मान प्राप्त हुए तथा साहित्‍य वाचस्‍पति उपाधि भी मिली। ‘वाटिका’, ‘एक दिल हजार दास्तान’, ‘भारतपुत्र नौरंगीलाल’, ‘पीपल की परी’, ‘सिकंदर हार गया’ आदि अमृतलाल नागर के कहानी संग्रह हैं। ‘बूँद और समुद्र’, ‘शतरंज के मोहरे’, ‘सुहाग के नूपुर’, ‘अमृत और विष’, ‘मानस का हंस’, ‘खंजन नयन’, ‘अग्निगर्भा’, ‘करवट’ तथा ‘पीढ़ियाँ’ उनके उपन्यास हैं। ‘सुनीति’, ‘सिनेमा समाचार’, ‘चकल्लस’, ‘नया साहित्य’, ‘प्रसाद’, ‘सनीचर’ आदि पत्रिकाओं का उन्होंने कुशलतापूर्वक संपादन किया। वयस्कों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी खूब लिखा। वे स्क्रीनप्ले तथा फ़िल्म के संवाद लिखते थे। फ़िल्म में डबिंग का काम करते थे। इन सबके अलावा वे पत्र लिखने में भी कुशल थे। उन दिनों इंटरनेट और मोबाइल न था अत: पत्र द्वारा ही मुख्य रूप से संपर्क साधा जाता था। उनके उपन्यासकार और कहानीकार रूप पर काफ़ी कुछ लिखा-पढ़ा गया है। मैं उनके पत्र लेखन पर कुछ बातें आप से साझा करना चाहती हूँ। पत्र लेखन प्रथा आज विलुप्तप्राय: है। लेकिन एक समय लोगों को जोड़ने का प्रमुख साधन पत्र हुआ करते थे। पत्र लिखने वाले के व्यक्तित्व के विषय में पत्र बहुत कुछ कहता है। अमृतलाल नागर ने परिवारजनों के अलावा अपने साहित्यिक मित्रों को पत्र लिखे। ये उनके निजी पत्र थे। आज उनके पत्र प्रकाशित हो कर सार्वजनिक हो गए हैं। अमृतलाल नागर के ये पत्र हिन्दी साहित्य की थाती हैं। उन्होंने बहुत अधिक संख्या में पत्र लिखे हैं। लेकिन वे खुद को पत्र लिखने के मामले में आलसी व्यक्ति कहा करते थे। उन्होंने हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक-समीक्षक डॉ. रामविलास शर्मा को खूब पत्र लिखे। दोनों मित्र महाकवि महाप्राण निराला के प्रिय थे। अमृतलाल नगर और डॉ. रामविलास शर्मा की दोस्ती ३० साल से अधिक लंबी रही। इस बीच दोनों एक-दूसरे से बराबर मिलते रहे। साथ ही दोनों ने एक दूसरे को खूब पत्र लिखे। इन पत्रों से हमें अमृतलाल नागर के सरल स्वभाव का पता चलता है। भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ के दर्शन होते हैं। हिन्दी को ले कर उनकी गहन चिंता और सरोकार दिखाई पड़ता है। लिखने के प्रति उनकी गंभीरता नजर आती है। वे रामविलास शर्मा के साथ मिल कर खूब योजनाएँ बनाया करते थे। कभी नई पत्रिका निकालने की योजना बनाते तो कभी हिन्दी को उसका उचित आसन दिलाने के लिए संघर्ष की योजना बनाते। उन्होंने अपनी भाव-निष्ठा से हिन्दी के लिए संगठन खड़ा किया। जब हिन्दी की अस्मिता पर आँच आ रही थी तो उन्होंने अनशन करने की योजना बनाई। हिन्दी के स्वाभिमान के लिए वे प्राण देने को तैयार थे। रामविलास शर्मा को उन्होंने पत्र में लिखा कि यदि आवश्यकता पड़ी और अनशन द्वारा प्राणांत होने की नौबत भी आ गई तो रामविलास शर्मा का तो महज एक दोस्‍त ही जाएगा। मगर उससे हिंदी के साहित्यिक गौरव और उसके स्‍वाभिमान की बिखरी चेतना में नए प्राण पड़ जाएँगे। वह संगठित हो जाएगी। इसके लिए उन्होंने अलग-अलग मुहल्लों में जा कर प्रतिदिन सभाएँ कीं। उन्होंने मातृभाषा की इज्जत के लिए लोगों को एकजुट किया। लोगों से स्पष्ट कहा कि उनका यह प्रयास विशुद्ध साहित्यिक है। अनशन की नौबत न आई। सरकार ने हिन्दी विधेयक पास किया तो वे सरकार की प्रशंसा भी करते हैं। दोनों मित्र मिल कर लिखने के नए-नए विषय चुनते और उस पर लेखन किया करते थे। अमृतलाल नागर की लिखने में आस्था थी। उनके अनुसार लेखन कार्य की आस्था ही उनका स्थाई भाव है। वे नियमित रूप से लिखा करते थे और दूसरों को भी यही सलाह देते थे। अपने मित्र को उन्होंने एक पत्र में लिखा कि जब बहुत जोश आए तो कुछ लिख डालो। हिन्दी वालों के दिल में हिन्दी के लिए चाहत जगाओ। जब बढ़ती उम्र के कारण स्वयं लिखने में अवश हो गए तो इमला बोल कर लिखवाया करते थे। उन्होंने ‘करवट’ तथा ‘पीढ़ियाँ’ अपने दो अंतिम उपन्यास बोल कर ही लिखवाए थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वे लेखन में सक्रिय रहे। २३ फ़रवरी १९९० को उनकी मृत्यु हुई। उपेंद्रनाथ अश्क ने उनके ‘मानस के हंस’ को पढ़ कर सराहा था। अपने पत्र में उनके इसी प्रयास के प्रति वे कृतज्ञता अर्पित करते हैं। वे लिखते हैं कि ‘मानस का हंस’ पर अश्क जी का पत्र पाने की उन्होंने आशा नहीं की थी। वे बेबाक लिखा करते थे। उन्होंने इस पत्र में उपेन्द्रनाथ अश्क को लिखा कि उन्हें चिरंजीवी नीलाभ और दूधनाथ सिंह की प्रशंसा अपने लिए अधिक कीमती लगी। वे लिखते हैं कि अश्क ने अपना उपन्यास लिखना छोड़ कर उनका उपन्यास पढ़ा और उसे सराहा तथा पत्र लिखा। यह अश्क की निश्छल, उदार-प्रकृति का प्रमाण है। अश्क के अनुसार राम का अर्थ कर्तव्य है। नागर जी लिखते हैं कि यह कर्तव्यपरायणता ही उनकी राम-भक्ति है। उनका राम गैबी बिल्कुल नहीं है। जितना कुछ है उसे वे यथार्थ के धरातल पर ला कर उजागर करते हैं। यही उनका संघर्ष है। जब रामविलास शर्मा की षष्ठी पूर्ति पर लिखना था तो अमृतलाल नागर उनके सन ४० से सन ६४ तक के लिखे पुराने पत्रों को सामने फ़ैला कर बैठ गए और अतीत की सुखद स्मृतियों में खो गए। ये पत्र लिफ़ाफ़ों, पोस्टकार्ड और अंतरदेशीय की शक्ल में थे। पत्रों के जरिए वे रामविलास शर्मा को एक व्यक्ति, एक दोस्त और एक साहित्यकार के रूप में याद करते हैं। निराला जी ने दोनों का परिचय कराया था, जो प्रगाढ़ दोस्ती में परिवर्तित हो गया। उन्हें रामविलास रिजर्व टाइप लगे जब कि नागर जी का स्वभाव खूब खुला और नि:संकोच था। दोनों को भाषा और शब्दों से लगाव था। वे शब्द विनोद किया करते थे। दोनों अंग्रेजी और योरूप के दूसरे साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करते। ये सब बातें उनके बीच घनिष्टता की मजबूत कड़ी थीं। दोनों खूब बहस करते लेकिन कभी कटु न होते। पत्रों में भी यह सिलसिला जारी रहा। १९३८ में अमृतलाल नागर ने ‘चकल्लस’ नाम से एक हास्य पत्रिका निकाली। इसका नामकरण शर्माजी ने ही किया था। इस पत्रिका का मैटर संजोने का जिम्मा रामविलास का था। यह कुछ नौजवानों का जोशीला सामूहिक प्रयास था। इस पत्रिका ने दोनों को और करीब ला दिया। दोनों मिल कर एक तख्त पर साथ बैठ कर पत्रिका के लिए विभिन्न नामों से लिखा करते। इन लोगों ने एक त्रैमासिक पत्रिका निकालने का भी विचार किया। वे इसमें साहित्यिक तथा वैज्ञानिक लेख प्रकाशित करना चाहते थे ताकि स्कूल-कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई हिन्दी में की जा सके। दोनों मिल कर हिन्दी साहित्य की उन्नति के संबंध में कल्पनाएँ करते। दोनों में काम करने का खूब जोश और उत्साह था। कुछ लोग रामविलास शर्मा को ईमानदार लेकिन अहंकारी समझते हैं। नागर जी पनए पत्र में उन्हें निडर, विनम्र और विनयशील मानते हैं। नागरजी खुले मन से उनकी प्रशंसा करते हैं और उन्हें सौम्य, गंभीर तथा विचारक मानते हैं। दोनों ने ऐसी दोस्ती थी कि जब रामविलास को डॉक्टरेट की डिग्री मिली तो बंबई में रह रहे नागर जी ने इसका समारोह मनाया। उन्हें लगा कि स्वयं उन्हें यह डिग्री मिली है। वे कहते हैं कि डॉक्टरी तो रामविलास को मिली पर उसका नशा उन पर चढ़ा है। उन दिनों डॉक्टर शब्द की कीमत बहुत थी। आज की तरह यह डिग्री इतनी सहज-सुलभ न थी। रामविलास शर्मा जैसे मित्रों को पत्र लिख कर वे बंबई का अपना श्रम-ताप हरा करते थे। नागरजी मस्तमौला व्यक्ति थे हिन्दी और लेखन के प्रति पूरी तरह से समर्पित लेकिन उन्हें किसी पार्टी अथवा संगठन का सदस्य बनना पसंद नहीं था। हाँ, रामविलास शर्मा जैसे मित्रों के पत्रों से उन्हें साहित्यिक लेखन-पठन की प्रेरणा मिलती थी। नागरजी को हिन्दी से लगाव था लेकिन वे दूसरी भाषाओं का आदर-सम्मान करते थे। शरदचंद्र को मूल में पढ़ने के लिए उन्होंने बांग्ला भाषा सीखी। शरत को उन्होंने बार-बार पढ़ा और उनसे मिलने कलकत्ता गए। वे शरत से खूब प्रभावित थे। साहित्य पढ़ना उनके लिए कभी केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा। यह उनके लिए अध्ययन का प्रधान विषय था। शरत ने उन्हें कहा था कि जो भी लिखो, वह अधिकतर अपने अनुभव के आधार पर लिखो। व्यर्थ की कल्पना के चक्कर में कभी न पड़ना। मैं जब उनसे मिली तो उन्होंने मुझसे भी यही कहा। मुझे प्रतिदिन कुछ-न-कुछ लिखते रहने की सलाह दी। अमृतलाल नागर जी ने सन १९८८, १४ जुलाई को मुझे भी एक पत्र लिखा था। यह पोस्टकार्ड मेरे लिए किसी थाती से कम नहीं है। मैं केरल जाने से पहले उनसे मिली थी। मेरा संबंध केरल से है यह जान कर उन्हें बहुत अच्छा लगा। इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि मैं खूब सुख भोगूँ और केरल के जगत्गुरु शंकराचार्य की तरह अखंड भारत को हृदयंगम करूँ। यही उनकी हार्दिक कामना थी। मेरे अनुवाद कार्य के विषय में जान कर उन्हें बहुत संतोष हुआ था। वे स्वयं भी बहुत अच्छे अनुवादक थे। उन्होंने ‘बिसाती’ नाम से मोपासाँ की कहानियों का अनुवाद किया। ‘प्रेम की प्यास’ नाम से फ़्लॉबेयर की ‘मैडम बोवरी’ का अनुवाद किया। इसके साथ ही उन्होंने मराठी की कई कृतियों का हिन्दी में अनुवाद किया। उनका मराठी और गुजराती भाषा पर भी अधिकार था। यह मेरा सौभाग्य है कि उनका दिया आशीर्वाद मेरे लिए फ़लित हो रहा है। हमारे देश में बड़ी संमृद्ध मौखिक परंपरा है। उस पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इस खतरे को नागरजी ने बहुत पहले भाँप कर, १८५७ की क्रांति के मौखिक इतिहास को ‘गदर के फ़ूल’ नाम से संकलित किया। आजकल सैक्स वर्कर पर काफ़ी काम हो रहा है। नागरजी ने १९६० में इस मुद्दे को उठाया। ‘ये कोठेवालियाँ’ उसी का प्रतिफ़ल है। अपने समकालीनों पर ‘जिनके साथ जीए’ नाम से उन्होंने संस्मरण लिखे। ‘चैतन्य महाप्रभु’ नाम से उन्होंने सृजनात्मक जीवनी लिखी। ‘साहित्य और संस्कृति’ नाम से उनके साहित्यिक और सृजनात्मक आलेख प्रकाशित हैं। ‘टुकड़े टुकड़े दास्तान’ नाम से उनके आत्मकथात्मक लेखन को उनके पुत्र डॉ. शरद नागर ने संजोया है। अमृतलाल नागर के पत्र पढ़ कर पता चलता है कि वे आस्तिक थे। अपने इष्ट देवों से मित्रवत व्यवहार किया करते थे। उनसे मजाकिया लहजे में संवाद करते थे। सरल इतने थे कि बारिश होने पर उनका मन मुक्त हो कर झमाझम बरस उठता था, हरहराती आनंदी नदी बन कर बहने लगता था। इस झमाझम बारिश के मौसम में हिन्दी के इस दीवाने को मेरी श्रद्धांजलि! ०००

Saturday, December 5, 2015

काव्य शास्र्व विनोदेन...

यह बात मैं पहले भी लिख चुकी हूँ कि साहित्य का चस्का बहुत बचपन से लग गया था। पढ़ना मेरे लिए एक शगल था, मनोरंजन था, पलायन था, खुद तथा आसपास के जीवन, लोगों को अंवेषण करने का जरिया था। साहित्य मेरे लिए दुनिया की सैर थी, जो थमने का नाम न ले। साहित्य मेरा ओढ़ना-बिछाना, खाना-पीना-सोना-जागना था। आज भी है। साहित्य साझापन माँगता है, चर्चा, विचार-विमर्श माँगता है। साहित्य परिवर्तन लाता है। मैं बदल रही थी। बड़ी जल्दी कहीं मैं खुद को सिमोन द बोउवार समझने लगी थी। बस तलाश थी एक ज्यॉ पॉल सार्त्र की, उसी के जैसे बुद्धिमान व्यक्ति की। आस-पास बहुत सारे लोग थे, बच्चे, जवान और बूढ़े भी मगर कोई सार्त्र न था। मैं किसी को सार्त्र मानने को राजी न थी, मेरी निगाह में उनमें से कोई उसके कैलीबर का न था। सार्त्र जिसमें तर्क का माद्दा हो, जो सुना सके तो सुनने को भी राजी हो, सुन भी सके। सार्त्र जो स्वतंत्र रहना चाहे और अपनी सिमोन को भी पूरी स्वतंत्रता से रहने दे। सार्त्र जिससे दुनिया के किसी भी विषय पर बात की जा सके। साहित्य के कारण मैं बदल रही थी, मेरी दुनिया बदल रही थी। साहित्य मुझे बता रहा था कि जो और जितना मैंने पढ़ा है, वह काफ़ी नहीं है, अभी और न जाने कितना और जानने को बाकी है। आज भी यह जानना शेष है और अब तो जीवन में जाल समेटने का वक्त आ पहुँचा है। साथ ही लगता है कि अभी बस शुरुआत हुई है। जीवन अथाह अर्थ लिए है और मैं तो बस किनारे पर ही रह गई, अभी तक डुबकी नहीं लगा सकी हूँ। उस समय तो जो भी पढ़ने को हाथ गलता उसे भकोस रही थी, जी, हाँ उसे भकोसना ही कहूँगी। क्योंकि तब मुझमें रुक कर जुगाली करते हुए पढ़े हुए को समझने-पचाने का न तो सलीका था और न ही मेरे पास धैर्य न था। बस जो हाथ लगता पढ़ती जाती। किताबें उन दिनों बहुत सस्ती हुआ करती थीं। यह ठीक है कि आज पैसे का मूल्य गिर गया है, फ़िर भी उन दिनों वे सस्ती थीं। एक-एक, दो-दो रुपए में उन दिनों सारा बाँग्ला, उर्दू, रूसी, अमेरिकन, इटैलियन साहित्य हिन्दी अनुवाद के रूप में उपलब्ध था। योजना का सदस्य बन कर पाँच-आठ रुपए में घर बैठे तीन-चार किताबें मँगाई जा सकती थीं, मँगवाई जाती थीं। इस योजना के लिए माताजी को पटा कर रखती थी, उनका हर हुक्म बजा लाती थी। जो किताबें आती वे सप्ताह भर में मैं चट कर जाती, बाकी के दिन अगली खेप का इंतजार करती और इस बीच कहीं-न-कहीं से और किताबों का भी इंतजाम कर लेती। कहीं का मतलब स्कूल-कॉलेज की लाइब्रेरी। पब्लिक लाइब्रेरी आस-पास न थी, न ही कोई किताबों का दीवाना आस-पास था। अब जब कोई किताब पढ़ता नहीं था तो किताब पर चर्चा क्या खाक करेगा। सो तलाश थी एक साथी की, वह भी सार्त्र जैसे साथी की। इस बीच लिखना शुरु हो चुका था। स्कूल मैगज़ीन में लिखा जा रहा था, हिन्दी विषय की परीक्षा के दौरान दूसरों के कोटेशन से अधिक अपने लिखे कोटेशन उत्तर में डाले जा रहे थे। इससे स्कूल में एक पहचान बन चुकी थी। ‘वही जो परीक्षा कॉपी में कोटेशन और कविताएँ लिखती है।’ लाइब्रेरियन पहचानती थी। एक बार कई वर्षों के बाद कॉलेज लाइब्रेरियन मिलीं, तो उन्होंने पहचान लिया और सबको बताया कि यह लड़की कैसे दिन-रात लाइब्रेरी में जमी रहती थी। कई लड़कियों के लाइब्रेरी कार्ड बटोर कर एक साथ कई किताबें ले जाती थी। वे मुझे लाइब्रेरी में ऊपर जा कर किताबें छूने और उलट-पुलट देखने और चुनने की आजादी देती थीं जो एक विशिष्ट बात थी, वरना पर्ची पर किताब का नाम लिख कर दो, किताब लो और दफ़ा हो जाओ, यही लाइब्रेरी का अलिखित नियम था। यह दीगर था कि बहुत लड़कियाँ लाइब्रेरी का रुख नहीं करती थीं। कॉपी में कविताएँ, शेरे लिखे जा रहे थे। कोटेशन लिखे जा रहे थे। डॉयरी निरंतर लिखी जा रही थी। लोकल अखबारों में एकाध रचना छप गई थी। फ़िल्मी पत्रिकाओं का निषेध था पर घर में धर्मयुग बिना नागा हर सप्ताह आता था, जिस पर पहला अधिकार मेरा हुआ करता था, मजाल है कोई मुझसे पहले छू ले, देख ले। धर्मयुग ने मेरी साहित्यतिक रूचि में इजाफ़ा किया। आज याद नहीं क्या लिखा था पर धर्मयुग से १५० रुपए का चेक आया। चेक क्रॉस था और उन दिनों बच्चों (कॉलेज जाने वालों को भी तब बच्चा ही माना जाता था) का बैंक एकाउंट नही होता था। अब क्या हो? सो पाँच रुपए में नया बैंक अकाउंट खोला गया और चेक जमा किया गया। अरे वाह! पासबुक, चेक बुक मिल गई। कॉपी में अपना लिखा जा रहा था, दूसरों के लिखे सुंदर अंश उतारे जा रहे थे, फ़िल्मी गीत भी उनमें हुआ करते। फ़िल्मी गीत साहित्य का अंग हैं। एक बार रात भर कवि सम्मेलन चला, रात भर मैं मन पसंद पंक्तियाँ अपनी कॉपी में टीपटी रही। यह सब होता था बड़ों यानी पिताजी से छिपा कर। इंजीनियर पिताजी के लिए विज्ञान के अलावा कोई अन्य विषय पढ़ने योग्य न था। यह एक मजेदार बात है कि वे खुद इंग्लिश और कभी-कभी हिन्दी साहित्य पढ़ते थे। उनकी एक छोटी-सी लाइब्रेरी थी और उनसे छिपा कर उसकी सारी हिन्दी किताबें मैं चट कर चुकी थी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी पढ़ाई के नाम पर साहित्य की राह पर है तो खूब डाँट पड़ी। पता नहीं कैसे उनके हाथ मेरी डायरी और कॉपी पड़ गई। उसे दिखा कर उन्होंने खूब उपदेश दिए, विज्ञान पढ़ने के फ़ायदे और साहित्य के नुकसान गिनाए। लंबा व्याख्यान देने के बाद ताकीद की कि इसके बाद यदि कभी उन्होंने मुझे कोर्स और विज्ञान के अलावा कुछ और पढ़ते देखा तो मेरी खैर नहीं। खैर नहीं का मतलब मेरी पढ़ाई बंद। घर वालों यानी माताजी और पिताजी के हाथ में यह तुरुप का पत्ता था। जब-तब धमकी मिलती कल से पढ़ाई बंद। मैं सब करने को तैयार थी मगर पढ़ाई छोड़ने को नहीं। गुस्से में उन्होंने एक बात और कही अगर सब लिखने लगे तो हो गया दुनिया का बेड़ा पार। दुनिया का बेड़ा पार करने के लिए तो मैं नहीं लिख रही थी, इसके लिए अभी भी नहीं लिखती हूँ। पिताजी ने मेरा लिखा पढ़ा, मेरी डॉयरी पढ़ी (तब तक मेरे लिए मेरा लिखा मेरा बहुत निजी मामला था, गोपनीय और नितांत अपना), यह मेरे लिए बहुत अपमान की बात थी। नजीजा हुआ, अपना सारा लिखा हुआ छत पर ले जा कर उसकी होली जलाना। रोती जाऊँ, पन्ने फ़ाड़-फ़ाड़ कर आग के हवाले करती जाऊँ। सब जला डाला। कुछ दिन मातम मनाती रही, कुछ नहीं लिखा। फ़िर भीतर फ़ड़फ़ड़ाहट होने लगी, तमाम विचार कागज पर उतरने को छटपटाने लगे। भूख न लगे, नींद न आए। न लिखने की कसम खाई थी पर लिखने का पागलपन पीछा नहीं छोड़ रहा था। कसम बहुत दिन न टिक सकी और एक दिन फ़िर कागज-कलम ले कर बैठी और कागज काले करने लगी। लिखने के बाद खूब रोई। क्यों? पता नहीं। प्रण न निभा पाने की मजबूरी, लिखने की खुशी, लिखने पर लगे अनावश्यक प्रतिबंध को तोड़ने का दु:ख। पता नहीं क्या था, पर मैं कई दिन खूब रोई। कई वर्षों बाद जब दीमक लगने के कारण एक अलमारी भर किताबें नष्ट करनी पड़ीं तब भी खूब रोई थी। हाँ, तो मैं तलाश में थी एक अदद सार्त्र की। अंतत: सार्त्र से मिलना हुआ। मगर इसमें मेरी तलाश का कोई हाथ न था। कहते हैं न बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख। तो मुझे बिन माँगे मोती मिल गया। बिना तराशा हुआ, बिना बिंधा हुआ मोती। दुनियादारी से दूर किताबों की दुनिया में रमा हुआ। हम दोनों को टीचिंग का चस्का भी एक जैसा। मुझ सिमोन को मेरा सार्त्र मिल गया। हाय रे मेरी किस्मत! सार्त्र मिला पर उसे हिन्दी न आती थी, मलयालम, संस्कृत, इंग्लिश आती थी। मलयालम, संस्कृत मेरे लिए काला अक्षर, भैंस बराबर। इंग्लिश पढ़ना-लिखना आता था, मगर यहाँ तो बोलना था। और इंग्लिश बोलने में मेरी जबान को काठ मार जाता था। अब बात कैसे हो, साहित्य चर्चा कैसे हो? मगर जहाँ चाह, वहाँ राह। मैंने इंग्लिश बोलनी सीखी और उन्होंने हिन्दी सीखी और बस अपनी तो चल पड़ी। मैं शादी किए बिना सिमोन की तरह रहना चाहती थी। मगर यह फ़्रांस न था, हम फ़्रेंच न थे। यह भारत था और हम भारतीय थे। इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि एक उत्तर भारतीय और दूसरा सुदूर दक्षिण से आया था। गॉड्स ओन कंट्री से यानी केरल से। हमारे संस्कार, हमारी संस्कृति भारतीय है। भारतीय समाज में आज से ३५-३६ साल पहले बिना विवाह किए छोटे शहरों में रहने का चलन न था। असल में आज भी नहीं है। हमारे परिवारों को यह रिश्ता पसंद था। अत: हमने विवाह किया, बिना बाजा और बारात के, बड़ों के आशीर्वाद से। अब मेरे पास सार्त्र है जिससे दुनिया-जहान के किसी भी विषय पर मैं बात कर सकती हूँ। जब मैं बोलती हूँ तो वह सुनता है, जब वो बोलता है, मैं सुनती हूँ। जो स्वतंत्र रहना चाहता है और जो दूसरों की स्वतंत्रता की कद्र करता है। जो खुद खूब लिखता-पढ़ता और पढ़ाता और मुझे लिखने-पढ़ने-पढ़ाने की भरपूर छूट देता है। जब मैं लिख रही होती हूँ तो बिना मुझे डिस्टर्ब किए चाय की प्याली, कभी-कभी खाने की थाली मेरे पास रख देता है। यदि अंधेरा होने लगता है तो चुपचाप आ कर लाइट ऑन कर देता है। चूँकि सत्य की खूब सुबह उठने और रात जल्दी सोने की आदत है और मैं रात देर से सोती हूँ। अत: जब सुबह उठती हूँ तो मेरे लिए शहद डला नींबू-पानी तैयार रहता है। सुबह की इतनी अच्छी शुरुआत! सत्य ने मुझे विश्व साहित्य से परिचित कराया। हरमन हेस, गुंटर ग्रास, मोलियर, लोर्का, लुई पिरांडलो से परिचित कराया। तकषि, ओ.वी.विजयन, कुरुप से परिचित कराया। कालीदास, भवभूति से परिचित कराया। वाल्मिकी की रामायण से परिचित कराया, व्यास के महाभारत के पात्रों से रू-ब-रू कराया। मैंने सत्य को प्रसाद, पंत, निराला, नामवर, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश, मन्नू भंडारी, निर्मला जैन, निर्मल वर्मा से परिचित कराया। प्रेमचंद, यशपाल, शरत, रवींद्र से वे पहले से मलयालम अनुवाद द्वारा परिचित थे। मैंने जीवन में बहुत सारी रूढ़ियों को तोड़ा है। मगर मैं चोली जला, बेलन उठा वाली नारीवादी नहीं हूँ। हाँ, सत्य का लेखन नारीवादी है। वे नारी का सम्मान करना जानते हैं। उन्होंने खुद ढ़ेर सारी रूढ़ियाँ तोड़ी हैं। हमने मिल कर एक नई परम्परा डाली है। इन ३५ सालों में दुनिया बदली है, हम बदले हैं। सत्य जिसे हिन्दी फ़िल्मों, कॉमेडी से सख्त चिढ़ थी, अब हिन्दी कॉमेडी फ़िल्मों से अपना मनोरंजन करते हैं। यह दीगर है कि तमाम हिन्दी फ़िल्में मलयालम फ़िल्मों का रीमेक होती हैं। अब वे धड़ल्ले से मुहावरेदार हिन्दी बोलते हैं। मैं विदेशी साहित्य और विदेशी फ़िल्मों की दीवानी हूँ। घर में किताबों-साहित्य के लिए खास स्थान है। लिखने का सिलसिला जारी है। यह भी सच है, हर बार प्रकाशित होने पर लगता है, इससे और अधिक अच्छा लिख सकती थी, लिखना चाहिए था। साहित्य ने मुझे मान-सम्मान दिया है। पाठक दिए हैं। नेट से जुड़े हुए दुनिया भर में फ़ैले हुए मेरे बहुत सारे साहित्यिक मित्र हैं। इस बीच हमारे घर में एक फ़ूल खिला है, एक सदस्य आया है। इस सदस्य ने किताबों के बीच आँखें खोलीं सो उसे भी लिखने-पढ़ने की लत है, अभी उसने पढ़ाना शुरु नहीं किया है। पता नहीं इस लाइन में जाएगी या नहीं लेकिन किताबों की कद्र करना उसे घुट्टी में मिला है। अब वह इतनी बड़ी और समझदार है कि उससे साहित्य चर्चा की जा सकती है। जिंदगी ने मुझे बहुत दिया है। अपनी ओर से थोड़ा-बहुत जोड़ कर मैं हिन्दी साहित्य को विरासत में दे जाऊँगी। यही कामना है। आमीन! ०००

Saturday, June 21, 2014

समकालीन भारतीय अंग्रेजी साहित्य: एक परिदृश्य

जब हम समकालीन भारतीय इंग्लिश साहित्य की बात करते हैं तो सबसे पहले हमारे सामने सलमान रुश्दी तथा अरुंधति राय का चेहरा आता है। दोनों में कुछ समानताएँ हैं, मसलन दोनों का जन्म भारत में हुआ। रुश्दी बंबई (आज के मुंबई) में पैदा हुए तो राय पूर्व के एक चाय बागान में जन्मी। दोनों इंग्लिश में लिखते हैं। दोनों ही विश्व प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं। दोनों को बुकर पुरस्कार मिला (राय को अपनी एकमात्र किताब ‘द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ के लिए), (रुश्दी को ‘मिडनाइट्स चिल्ड्र’ के लिए १९८१ में बुकर, १९९२ में बुकर ऑफ़ बुकर्स तथा २००८ में बेस्ट ऑफ़ द बुकर्स अब तक तीन बार)। शायद यहीं दोनों की समानता समाप्त हो जाती है। रुश्दी बहुत पहले भारत छोड़ कर चले गए उन्होंने ब्रिटेन की नागरिकता स्वीकार ली है। वैसे आज संचार और यातायात की सुविधा के कारण भारत से उनका संबंध बराबर बना हुआ है, पूरी दुनिया घूमते हुए वे भारत भी आते-जाते रहते हैं। सारी सुविधाओं और संभावनाओं के बावजूद अरुंधति राय भारत में ही बनी हुई हैं। दुनिया घूमती हैं लेकिन भारत उनका घर है। राय मात्र एक उपन्यास लिख कर, साहित्य से खुद को लगभग काट कर सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन की ओर मुड़ गई, देश की सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों के साथ शिद्दत से जुड़ी हुई हैं। पूर्णकालीन एक्टिविस्ट बन गई हैं। दूसरी ओर सलमान रुश्दी साल-दर-साल निरंतर साहित्यिक कृतियाँ प्रस्तुत करते जा रहे हैं। राय को उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ प्रकाशित होने के पहले ही करोड़ों की रॉयल्टी की बात से दुनिया चौंक गई, रुश्दी पूरी दुनिया के चिंता और चर्चा के विषय बन गए जब उन्होंने ‘सैटानिक वर्सेस’ लिखा और ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी ने इसे इस्लाम और मोहम्मद की अवमानना माना तथा उनकी मौत का फ़रमान जारी कर दिया। उनका सिर लाने वाले को न केवल धार्मिक सबब मिलना था वरन खुमैनी ने उसे एक बड़ी रकाम देने की भी घोषणा की। रुश्दी को भूमिगत होना पड़ा, न मालूम कितने ठिकाने बदलने पड़े, उनकी सुरक्षा के लिए सरकारों को और स्वयं उनको बेतहाशा रकम खर्च करनी पड़ी। आज उनका सर कलम करने का आदेश जारी करने वाला इस दुनिया से खुद जा चुका है और रुश्दी निरंतर साहित्य में डूबे हुए हैं। उनकी जिंदगी को अभी भी खतरा है, न जाने कब कोई सिरफ़िरा खुमैनी की बात पर अमल कर जाए। ‘सैटानिक वर्सेस’ के पहले वे ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’, ‘हारुन रशीद एंड अदर स्टोरीज’, ‘शेम’ आदि लिख कर प्रसिद्धि पा चुके थे। इसके बाद उन्होंने ‘मूर्स लास्ट शाई’, ‘द ग्राउंड विनीथ हर फ़ीट’, ‘शालीमार द क्लाउन’ लिखा है और अभी हाल में उनका ‘द एंचांट्रेस ऑफ़ फ़्लोरेंस’ आया है। जब-जब उनकी कृति आती है साहित्य जगत में लहर उठती है। पाठक और आलोचक दोनों अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। वे दोनों के चहेते हैं। वे अपने साहित्य से समाज में हिलोर लाने के साथ ही अपने निजी जीवन से भी कम हिलोरें नहीं उठाते हैं। उनका रहन-सहन, उनके विवाह-तलाक सबकी खूब गर्मागरम चर्चा होती है। सेलेब्रेटी होने का फ़ायदा और खामियाजा दोनों उन्हें उठाना पड़ता है। वे भारतीय भाषाओं के साहित्य पर टिप्पणी करने के लिए भी चर्चित रहे हैं। जब उन्होंने भारत की पचासवीं सालगिरह के अवसर पर ‘द विन्टेज बुक ऑफ़ इंडियन राइटिंग: १९४७-१९९७’, का संपादन किया तो भारतीय भाषा में लिखे साहित्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखा था। इसको लेकर भारत में उनकी खूब आलोचना हुई थी, मजे की बात यह थी कि आलोचना में इंग्लिश भाषी भी शामिल थे। इसी तरह जब अमित चौधुरी ने ‘द पिकाडोर बुक ऑफ़ मॉडर्न इंडियन लिटरेचर’ का संपादन किया तो उनके विचार भी भारतीय भाषा-साहित्य तथा लेखकों के प्रति कुछ ऐसे थे कि बहुत आलोचना हुई। इन सबके बावजूद उनके लेखन का लोहा रुश्दी के विपक्षी भी मानते हैं। वे पहले भारतीय इंग्लिश में लिखने वाले साहित्यकार हैं जिसने भारतीय इंग्लिश को उसकी विशिष्टता के साथ स्थापित किया। जिसकी भाषा में भारतीय समाज तथा जीवन के साथ भारतीय भाषा के मुहावरे और शब्द भी समाहित हुए हैं। जिसने इंग्लिश को एक नई खुशबू, एक नई पहचान दी है। इंग्लिश के इस नए रूप को विश्व साहित्य में आधिकारिक पहचान दी है। वे वैश्विक स्तर पर लिखते हैं मगर आज भी उनकी जड़ें भारत में मजबूती से जमी हुई हैं। एक बार सलमान रुश्दी और नोबेल पुरस्कृत जर्मन साहित्यकार गुंटर ग्रास ने बातों के दौरान एक-दूसरे कहा कि जैसे गुंटर ग्रास को अपने शहर डेंजिंग से दूर रहने का दु:ख है वैसे ही रुश्दी को बंबई से दूर रहने का दु:ख है। मगर यह अपने-अपने शहरों से दूर रहना उनके लिए प्रेरणा का काम करता है। जैसे रुश्दी के लिए बंबई सृजनात्मकता का स्रोत है, अपने भीतर की भावनाओं को प्रकट करने का स्थान भी है। वैसे ही ग्रास के लिए उनका अपना शहर डेंजिंग है। भीतर की बात जानने वाले कई लोग इस बात का दावा करते हैं कि रुश्दी का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए कई बार जा चुका है और बस उनको साहित्य का यह सबसे बड़ा पुरस्कार मिलने ही वाला है। पुरस्कार मिले या नहीं पाठ्कों और आलोचकों को रुश्दी की अगली किताब का बेसब्री से इंतजार है। अरुंधति की जड़ें भारत खासकर केरल में हैं। उनके उपन्यास का पूरा मजा उठाने के लिए केरल के समाज और संस्कृति की जानकारी जरूरी है वरना उसकी गहराई, उसकी खुशबू, उसकी रंगत, उसकी बहुआयामी रंगीन छटा के हाथ से फ़िसल जाने का खतरा है। शायद इसी कारण हिन्दी का अधिकाँश पाठक उसकी उतनी सराहना न कर सका जितनी सराहना की यह कृति हकदार है। राय को अपने पुरुष पात्रों पापाची, एस्थर, वेलुथा, चाको को गढ़ने के लिए सदैव याद किया जाएगा। करीब-करीब आत्मकथात्माक उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ दलित, स्त्री, मार्क्सवाद आदि कई मुद्दे शिद्दत के साथ उठाता है। भाषा से खेलना अरुंधति की एक अन्य विशेषता है। इस कारण आज तक उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ के जितने भी अनुवाद हुए हैं, मूल की तुलना में काफ़ी कुछ गँवा बैठे हैं। यहाँ तक कि इसका मलयालम अनुवाद भी। एक लंबे समय तक इंगलैंड का उपनिवेश रहने के कारण अंग्रेजी बहुत समय तक भारत पर शासन की भाषा बनी रही। इसी भाषा में शिक्षित लोगों की रहनुमाई में हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, यह बात दीगर है कि ये सारे नेता जनता से संपर्क के लिए हिन्दी भाषा का ही उपयोग करते रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी इंग्लिश यहाँ की प्रमुख भाषा है। यह क्लास विभाजन की एक पहचान भी है। आज यह भाषा विश्व के लगभग सारे देशों में प्रयोग की जाती है। स्वाभाविक सी बात है कि कई लोग अपने सृजनात्मक लेखन, अपनी अभिव्यक्ति के लिए भी इसी भाषा का प्रयोग करते हैं। कुछ समय तक अंग्रेजी में साहित्य रचने वाले भारतीयों की शुमारी अंग्रेजी साहित्य में न के बराबर थी। ले देकर आर के नारायण, मुक्लराज आनंद या राजा राव का नाम लिया जाता था। इंडियन इंग्लिश को पहले ‘दोगलों की भाषा’ कहा जाता था, अक्सर अंगूर खट्टे हैं वाली प्रवृति के लोग इस शब्द का प्रयोग करते थे। ऐसे लोग कहते थे कि अंग्रेज चले गए और अपने पीछे अपनी दोगली संतान छोड़ गए उनका इशारा एंग्लो-इंडीयन्स की ओर होता था। चूँकि ये लोग अपने दैनंदिन जीवन में भी इंग्लिश का प्रयोग करते थे अत: इस भाषा को भी ‘दोगला’ कहा जाने लगा। आज स्थिति बदल गई है। भारत में बोली जाने वाली इंगलिश अब ‘क्वीन्स इंग्लिश’ नहीं रह गई है। इसे हिन्दी के शब्दों की भरमार होने के कारण अब ‘हिंग्लिश’ भी कहा जाता है। समीक्षक मीनाक्षी मुखर्जी भारतीय इंग्लिश लेखन को ‘द्विज’ मानती हैं। आज भारत की अन्य भाषा के समान यह भी भारत की एक महत्वपूर्ण, बल्कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषा है। जो भी कहा जाए आज इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारतीयों द्वारा लिखी जाने वाली इंग्लिश चाहे वह साहित्य हो अथवा साहित्येतर सामग्री उसकी देश के भीतर ही नहीं विश्व में भी माँग बढ़ी है। टीवी, डॉक्यूमेंट्री की माँग है कि इस भाषा में साहित्य के साथ विचार और तथ्य प्रस्तुत किए जाए। विश्व बाजार में भी भारत को लेकर उत्सुकता है, बाहर लोग यहाँ के विषय में जानना चाहते हैं अत: यह एक तथ्य है कि इस भाषा और इसमें रचा गया लेखन भविष्य में रहने वाला है। उसकी माँग बढ़ने वाली है खासकर जब भारत में अगली पीढ़ी के बहुत सारे बच्चे इसी भाषा के माध्यम से शिक्षित हो रही है। अब इसकी साख का पता हर वर्ष होने वाले साहित्य उत्सवों से भी चलता है। साउथ एशियन लेखकों का एक अपना समुदाय है, एक अपनी पहचान है जिसमें भारतीय इंग्लिश साहित्य का विशिष्ट स्थान है। विश्व का कोई साहित्य समारोह इसके बिना सम्पन्न नहीं हो सकता है। जब हम भारतीय अंग्रेजी साहित्य कहते हैं तो इसका तात्पर्य होता है भारत के उन लेखकों का कार्य जो अंग्रेजी में लिखते हैं मगर जिनकी अपनी भाषा यानि मातृभाषा भारत की कोई अन्य भाषा हो सकती है। इसमें हम उस प्रवासी भारतीयों के साहित्य को भी समाहित करते हैं जो भारत के बाहर दुनिया भर में फ़ैले हुए हैं, जैसे सलमान रुश्दी, भारती मुखर्जी, चित्रा बैनर्जी दिवाकर्णी। उनको भी शामिल करते हैं जिनके पूर्वज भारतीय मूल के थे और जिनका जन्म किसी अन्य देश में हुआ है, जैसे वी एस नायपॉल। इसे इंडो-एंग्लिकन और उत्तरोपनिवेशिक (पोस्ट कलोनियल) साहित्य की संज्ञा से भी जाना जाता है। इंडियन इंग्लिश लिटरेचर का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। रवीन्द्रनाथ टैगोर अंग्रेजी में भी लिखते थे, अनुवाद भी करते थे। वे एशिया के पहले लेखक थे जिसे नोबेल पुरस्कार मिला। विश्वकवि होते हुए भी वे सदैव बाँग्ला के लेखक ही कहलाए। बंकिम चंद्र ने १८६४ में अपना पहला ही उपन्यास ‘राजमोहन्स वाइफ़’ इंग्लिश में लिखा था। मगर अच्छा हुआ वे इसके बाद बांग्ला में ही लिखते रहे वरना पाठक उनके कालजयी साहित्य से वंचित रह जाता और पहला उपन्यास कुछ खास नहीं बन पड़ा था। मुल्कराज आनन्द, राजा राव तथा आर के नारायण को भारतीय इंग्लिश लेखन का जनक माना जाता है। राजा राव को इस क्षेत्र में अग्रणी होने का श्रेय जाता है। जेम्स जॉयस, कार्ल मार्क्स और महात्मा गाँधी से प्रेरित संस्कृत के प्रकांड विद्वान राजा राव का ‘काँतापुरा’, ‘सर्पेन एंड रोप’ अंग्रेजी साहित्य में आदर के साथ स्वीकार किए जाते हैं। उन्होंने भारतीय दर्शन को साहित्य के माध्यम से अंग्रेजी भाषी दुनिया में स्वीकृति दिलाई। इसी तरह आर के नारायण और मुल्कराज आनंद का भी ऐतिहासिक महत्व है। नारायण ने मालगुड़ी को साहित्य में अमर कर दिया और स्वामी के द्वारा भारत के बाहर भारतीय जीवन की छवि पहुँचाई। उनके ‘मालगुड़ी डेज’, ‘स्वामी एंड फ़्रेंडस’ पर सीरियल भी बने हैं। वे अपनी मृत्यु तक लेखन में सक्रिय थे। वे अपने साहित्य में रूढ़ि और आधुनिकता के संघर्ष को प्रस्तुत करते रहे। उनके यहाँ हल्का-फ़ुल्का हास्य मिलता है जो पाठक को गुदगुदाता है साथ ही चिंतन के लिए प्रेरित भी करता है। मुल्कराज आनन्द ने इंग्लैंड में रहते हुए टी एस इलिएट की पत्रिका ‘क्राइटेरियन’ में लिखना प्रारंभ किया। ई एम फ़ोस्टर, जॉर्ज ऑर्वल, हेनरी मिलर से उनकी दोस्ती थी और वे ब्लूमस्बरी के सदस्य थे। ९९ साल की उम्र में जब २००४ में उनकी मृत्यु हुई वे तमाम उपन्यास और अन्य साहित्येत्तर रचना कर चुके थे। सात खंड की आत्मकथा के चार खंड प्रकाशित हो चुके थे। ‘अनटचेबल’ से प्रसिद्धि की सीढ़ियाँ उन्होंने प्रारंभ की और ‘कूली’, ‘टू लीव्स एंड अ बड’ जैसे उपन्यास लिखे। ‘द विलेज’, ‘अक्रॉस द ब्लैक वाटर’ तथा ‘द सोर्ड एंड द सिकेल’ उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। उन्हें ‘मार्ग’ पत्रिका की स्थापना के लिए भी सदैव स्मरण किया जाएगा। मुल्कराज भारत की जाति-प्रथा, धर्म तथा वर्गगत विभाजन पर बहुत कटुता और क्रूरता के साथ लिखते रहे। दूसरी ओर कवि, अनुवादक प्रो. पी लाल ने न केवल महाभारत को फ़िर से ट्रांसक्राइब किया है, वरन कलकत्ता में अपनी प्रेस ‘राइटर्स वर्कशॉप’ स्थापित करके भारतीय अंग्रेजी लेखन को मजबूती प्रदान की। ‘राइटर्स वर्कशॉप’ वन मैन शो होते हुए भी अपने आप में एक इंड्रस्ट्री था। अभी कुछ दिन पहले प्रो. लाल की मृत्यु हो गई है। आज के बहुत सारे लेखकों को गर्व है कि उनकी पहली किताब यहीं से प्रकाशित हुई। ग्रामीण जीवन का चित्रण कमला मारकंडेय के ‘नेक्टर इन ए सीव’ में भी मिलता है। पुरानी पीढ़ी की कमला मारकंडे अपने कॉलेज जीवन से ही लेखन कर रही थीं और बाद में १९४८ में इंग्लैंड जा बसीं। उन्होंने एक इंग्लिशमैन से विवाह किया और बराबर इंग्लिश में लिखती रहीं। ‘नेक्टर इन ए सीव’ के अलावा मारकंडे ने ‘सम इनर फ़्यूरी’, ‘ए साइलेंस ऑफ़ डिजायर’, ‘पैशन’, ‘ए हैंडफ़ुल ऑफ़ राइस’, ‘द कॉफ़र डैम्स’, ‘द नोव्हेयर मैन’, ‘टू वर्जिन्स’, ‘द गोल्डेन हनी कोम’, तथा ‘प्लेजर सिटी’ आदि दस उपन्यास लिख कर स्त्री-व्यथा को स्वर दिया। स्त्री विषयक मुद्दे और उसकी समस्याएँ ही सदैव उनके साहित्य की प्रमुख विषय-वस्तु रही। पुरानी पीढ़ी के लेखकों पर आरोप लगता रहा है कि वे दुनिया को भारत की वही तस्वीर दिखाते थे जो बाहर वाले देखना चाहते थे यानि कि गरीबी, भुखमरी, जातिगत, धर्मगत भेदभाव। छूआछूत, मदारी, जादू टोना यही भारत ये लोग अपने साहित्य में पेश करते रहे। नए लेखकों का दृष्टिकोण व्यापक है। जब हम समकालीन साहित्य की बात करते हैं तो वह मात्र कुछ दशक पुराना है। इस साहित्य को हम पिछली सदी के आठवें दशक से फ़ैलता-फ़ूलता पाते हैं। विश्व के अंग्रेजी साहित्य के मानचित्र पर भारतीय अंग्रेजी साहित्य को स्थापित करने का श्रेय नि:संदेह सलमान रुश्दी को जाता है। आज भले ही वे दूसरे देश के ग्रीन कार्ड होल्डर हैं पर उनकी पैदाइश भारत की है। रुश्दी और राय के अलावा इस परिदृश्य पर अब हमें ढ़ेर सारे साहित्यकार नजर आते हैं। हरेक पर एक पूरा आलेख हो सकता है। इस आलेख की सीमा में सबके साथ न्याय कर पाना कठिन है। बहुत सारे केवल गिनाए गए हैं, कई छूट भी गए हैं, या छूट गए होंगे। हर पाठक की अपनी रूचि और सीमा होती है। अनिता देसाई एक प्रमुख साहित्यकार हैं, ‘इन कस्टडी’ उनका सर्वोत्तम कार्य कहा जा सकता है जिसमें वे भारत की एक अन्य भाषा उर्दू और उससे जुड़ी संस्कृति के पतन की दास्तान सुनाती हैं। इस पर एक बहुत सुंदर फ़िल्म भी बनी है। मरता हुआ अतीत वर्तमान के लिए बोझ होता है ऐसा वे मानती हैं। जर्मन माँ और बंगाली पिता की संतान अनीता का जन्म मसूरी में हुआ। कायदे से उनकी मातृ भाषा जर्मन होनी चाहिए थी या फ़िर उन्हें बाँग्ला में लिखना चाहिए था मगर उनकी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई और उन्होंने सदैव इसी भाषा में स्वयं को अभिव्यक्त किया। उन्होंने एक गुजराती व्यक्ति से विवाह किया। उनके साहित्य में भारतीय शहरी आदमी के विभ्रम को हम देखते हैं। वे मनुष्यों के आपसी जटिल संबंधों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। ‘इन कस्टडी’ के अलावा ‘क्राई द पिकॉक’, ‘वॉयजेज इन द सिटी’, ‘बाई बाई ब्लैक बर्ड’, ‘व्हेयर शैल वी गो दिस समर?’, ‘फ़ायर ऑन द माउंटेन’ आदि उनके दस उपन्यास उपलब्ध हैं। उन्होंने बच्चों के लिए भी खूब लिखा है। बच्चों के बीच रस्किन बाँन्ड भी बहुत पसंद किए जाते हैं। माँ के नक्शे-कदम पर चलते हुए लेकिन माँ से बिल्कुल भिन्न शैली और कथानक ले कर आती हैं अनीता देसाई की बेटी किरण देसाई। वे आज के दौर में सच में विश्व नागरिक हैं। किरण ने १४ साल की उम्र में भारत छोड़ कर विदेश रहने का फ़ैसला किया। पहले वे इंगलैंड गई फ़िर अमेरिका। आजकल वे नोबेल पुरस्कृत तुर्की लेखक ओरहान पामुक के साथ रह रही हैं। प्रवासी के अनुभव को लेकर उन्होंने ‘द इन्हेरिटेंस ऑफ़ लॉस’ की रचना की। ‘स्ट्रेंज हैप्पनिंग इन द ग्वावा ओचर्ड’ उनकी एक अन्य किताब है। उनके यहाँ भारत का औपनिवेशिक, उत्तर-औपनिवेशिक जीवन, भूमंडलीकरण, क्रूर अत्याचार सब देखने को मिलता है। १९४० में कलकत्ते में जन्मी भारती मुखर्जी पढ़ने के लिए कैनेडा गई। वे वहीं अपने एक साथी से विवाह कर बस गईं। वही की नागरिकता ले ली। मुखर्जी १९६० से १०८० तक कैनेडा में रह कर लेखन तथा अध्यापन करती रहीं। फ़िर वे अमेरिका में बस गई उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली। ‘द टाइगर्स डॉटर’, ‘वाइफ़’, ‘डेज़ एंड नाइट्स’, ‘द मिडिलमैन एंड अदर स्टोरीज’, ‘हॉल्डर ऑफ़ द वर्ल्ड’, ‘द सोरो एंड द टेरर’ उनकी रचनाएँ हैं। उनके यहाँ प्रवासी अस्मिता की खोज, प्रवासी मन की द्विविधा, प्रवासी के खंडित व्यक्तित्व पर काफ़ी कुछ पढ़ने-समझने को मिलता है। ‘द टाइगर्स डॉटर’ की तारा स्वयं लेखक के व्यक्तित्व तथा अनुभवों को विस्तार से प्रस्तुत करती है। जिसे न अमेरिका में अपने अमेरिकी पति के साथ चैन मिलता है और न जो भारत अपने परिवार में लौट कर प्रसन्न है। उसे एक ओर अपना मूल परिवेश खींचता है वहीं दूसरी ओर जब वह कलकता परिवार से मिलने आती है तो खुद को परिवार, रिश्तेदारों तथा मित्रों को बीच मिसफ़िट पाती है। सात साल में वह अपने परिवार के कई रीति-रिवाज भूल चुकी है। उसे यह देख कर दु:ख होता है कि भारत में लोग विदेशी चीजों की प्रशंसा करते हैं, उनके पीछे मरते हैं मगर जब कोई किसी विदेशी से विवाह कर लेता है तो उसे अपनाने से कतराते हैं। यहाँ तक कि माँ भी। उसे पूरा माहौल अजनबी लगता है वह जल्द से जल्द अमेरिका अपने पति के पास लौट जाना चाहती है। मगर कहानी यह नहीं स्पष्ट करती है कि वह अमेरिका जा पाती है अथवा नहीं। हाँ, अंत में उसे उत्पातियों से घिरे हुए अवश्य दिखाया गया है। ‘द मिस्ट्रेस ऑफ़ स्पाइसेज’ से प्रसिद्धी पाने वाली चित्रा बैनर्जी दिवाकर्णी अमेरिका में रहते हुए वहाँ के विश्वविद्यालय में क्रिएटिव राइटिंग का शिक्षण करती हैं। उनकी ‘द मिस्ट्रेस ऑफ़ स्पाइसेज’ पर फ़िल्म भी बनी है जिसमें ऐशवर्या राय ने प्रमुख भूमिका की है। ‘सिस्टर ऑफ़ माई हार्ट’, ‘द वाइन ऑफ़ डिजायर’, ‘क्वीन ऑफ़ ड्रीम्स’ दिवाकर्णी के अन्य उपन्यास हैं, ‘अरेंज्ड मैरेज’ तथा ‘द अननोन इरोज ऑफ़ अवर लाइव्स’ इनके कथा संग्रह हैं। दोनों कहानी संग्रह पर उन्हें पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इतना ही नहीं दिवाकर्णी के चार काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। झुम्पा लाहिरी भी एक ऐसी ही लेखिका हैं जो खुद बाहर रहती है और अपने साहित्य में प्रवासी की सांस्कृतिक अस्मिता की खोज करती हैं। अपने पहले ही कार्य ‘दि इंटरप्रेटर ऑफ़ मेलाडीज’ से ही वे खासी चर्चित रही हैं अपनी साहित्यिक समझ के लिए। उन्होंने अपने लेखन में प्रवासी जीवन को उठाया है। इसे २००० का पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उपन्यास ‘द नेमसेक’ एक युवा की दृष्टि से प्रवासी जीवन को दिखाता है। वे प्रशंसा और आलोचना दोनों की शिकार होती रही हैं। भारतीय मूल के नॉयपॉल का साहित्य रुश्दी के साहित्य से बहुत अलग है। उनके पूर्वज भारत से गिरमिटिया के रूप में बाहर ले जाए गए थे। नोबेल पुरस्कृत नॉयपॉल फ़िक्शन से ज्यादा अपने नॉन-फ़िक्शन तथा अपनी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। भारत के प्रति उनकी धारणा प्रारंभ में बहुत नकारात्मक थी। बार-बार यहाँ की यात्रा करने के कारण अब वे भारत को उसकी जटिलताओं के साथ कुछ-कुछ समझने लगे हैं और उनका नजरिया बदल रहा है। विद्याधर सूरजप्रसाद नॉयपॉल ने ‘द मिस्टिक मैस्यू’, ‘मिग्युअल स्ट्रीट’, ‘हाउस ऑफ़ मिस्टर बिस्वास’, ‘एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस’, ‘दि एनिग्मा ऑफ़ एराइवल’, ‘अ वे इन द वर्ल्ड’, ‘मैजिक सीड्स’ आदि कई साहित्यिक और साहित्येत्तर रचनाएँ की हैं। (विस्तार के लिए देखें संवाद प्रकाशन से आई ‘अपनी धरती, अपना आकाश: नोबेल के मंच से’ – विजय शर्मा) कहने को तो ‘नाइनटीन एट्टीफ़ोर’ के प्रसिद्ध जॉर्ज ऑरवल को भी इसी श्रेणी में यानि भारतीय अंग्रेजी लेखकों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ऑरवल का जन्म बिहार के मोतीहारी जिले में हुआ था। उन्होंने साहित्य को कई मुहावरे और शब्द दिए हैं। ‘नाइनटीन एट्टीफ़ोर’ के अलावा उन्होंने ‘बर्मीज डेज’, ‘एनीमल फ़ार्म’ भी लिखा। पारसी मूल के रोहिंग्टन मिस्त्री का भारतीय अंग्रेजी साहित्य में विशिष्ट स्थान है। उनकी ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’ नेहरू युग के बाद के भारत में पारसी जीवन को बड़ी शिद्दत और खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास इंदिरा गाँधी के शासन काल में सामान्य जीवन को चित्रित करती है। उसमें एक दृश्य है जिसमें एक राजनैतिक मीटिंग की तैयारी, मीटिंग और उसके बाद के पूरे परिदृश्य को बहुत विस्तार के साथ चित्रित किया गया है। यथार्थ के वर्णन के लिए वे याद रहते हैं। ‘फ़ैमिली मैटर्स’ तथा ‘ए फ़ाइन बैलेंस’ उनकी अन्य पुस्तकें हैं। इसी तरह बाप्सी सिद्धवा भी पारसी मूल की हैं और इंगलिश में लेखन करती हैं। कहने को वे पाकिस्तानी हैं मगर विभाजन पर उनका साहित्य लाजबाव है। उनके उपन्यास ‘आइस-कैंडी मैन’ में विभाजन को एक छोटी बच्ची की दृष्टि से दिखाया गया है। विभाजन की भयंकरता, शारीरिक और मानसिक अत्याचार और संवेगात्मक रूप से लोगों के टूटने को यह उपन्यास बड़ी बारीकी से दिखाता है। इस पर बनी फ़िल्म भी खूब चर्चित रही। कहानी तथा स्क्रीनप्ले राइटर रुथ परवेज झाबवाला भी प्रवासी की पीड़ा को अपने लेखन में अभिव्यक्त करती हैं। उपमान्यु चैटर्जी ‘इंग्लिश अगस्ट’ बना कर बहुत पहले इस क्षेत्र में स्थापित हो गए थे। जिस पर फ़िल्म बनी मगर दर्शकों ने उसे खास तवज्जो नहीं दी। वे भारतीयों की कमजोरियों का व्यंग्यात्मक रूप से दर्शन करते-कराते हैं। वही दिखाने की कोशिश करते हैं जो पश्चिम अभी भी भारत के विषय में देखना-पढ़ना चाहता है। वैसे आज विश्व में भारत की छवि बहुत बदल चुकी है। आर्थिक उदारवाद, भूमंडलीकरण तथा आईटी सेक्टर ने भारतीयों को उनका उचित स्थान दिलाने में मदद की है। शायद इसीलिए अस्सी के बाद की पीढ़ी के लेखक जैसे चेतन भगत, अरविंद अडिगा, किरन देसाई, मंजु कपूर, पंकज मिश्रा आदि आज के युवा पाठकों की पहली पसंद हैं। भारत की हँसी उड़ा ने के बावजूद उपमान्यु चैटर्जी की ‘द मैमरीज ऑफ़ द वेलफ़ेयर स्टेट’ खूब चर्चित हुई। उपनिवेशवाद ने भारतीयों के जीवन पर क्या प्रभाव डाला है यह जानने के लिए साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अमिताव घोष को पढ़ना रोचक होगा। २००१ में जब अमिताव घोष को उनकी किताब ‘द ग्लास पैलेस’ के लिए यूरेशियन कॉमनवेल्थ राइटर्स प्राइज़ देने की पेशकश की गई तो उन्होंने अपने सिद्धांत के तहत इसे लेने से इंकार कर दिया। ‘द सर्किल ऑफ़ रीजन’, ‘द ग्लास पैलेस’, ‘द कलकत्ता क्रोमोसोम: ए नोवेल ऑफ़ फ़ेवेर्स’ तथा ‘द हंग्री टाइड’ उनकी अन्य पुस्तकों के नाम हैं। उन्होंने भारत तथा मिस्र के संबंधों पर ‘इन एन एंटिक लैंड: हिस्त्री इन द गाइज ऑफ़ ए ट्रैवलर्स टेल’ भी लिखा है जो नॉन फ़िक्शन की श्रेणी में आता है। ‘द हंग्री टाइड’ में घोष ने एक ऐसा विषय उठाया है जिस पर आमतौर पर साहित्य नहीं मिलता है। उनकी इस रचना का विषय बंगाल का सुंदरबन का क्षेत्र और वहाँ का जनजीवन है। यहीं पर भारत का प्रसिद्ध बंगाल टाइगर का निवास स्थान भी है जो आज विलुप्ति के कगार पर है। उन्होंने भारतीय मूल की एक शोधकर्ता युवति, सुंदरबन के निवासी तथा एक अन्य व्यक्ति को लेकर अपनी कथा गूँथी है। इस कथा में स क्षेत्र का इतिहास, लोक कथाएँ, लोक विश्वास, भूगोल, पर्यावरण सब समाहित है। विक्रम सेठ का १९९४ में लिखा उपन्यास ‘ए सूटेबल ब्यॉय’ कुछ नहीं तो अपनी लम्बाई के लिए अवश्य याद किया जाएगा। अब सेठ ने इसका अगला भाग भी लिख दिया है। उनकी पहली किताब ‘द गोल्डेन गेट’ सेन फ़्रांसिस्को में रह रहे एक युवा का रोजनामचा है जिसे उन्होंने पद्यात्मक शैली में लिखा। ‘एन इक्वल म्यूजिक’ तथा ‘टू लाइव्स’ उनकी अन्य रचनाएँ हैं। वे बहुत हल्का-फ़ुल्का मनोरंजक लिखने के लिए जाने जाते हैं। उपन्यासकार के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी हैं। वैसे उनका कवि रूप काफ़ी कुछ अनजाना ही रहा है। अब तो उनकी माँ लीला सेठ भी अपनी आत्मकथा लेखन के बल पर साहित्यिक हलके में जानी जाने लगीं हैं। १९८० के बाद भारतीय इंग्लिश लेखन में बहुत सारे लोग उभर कर आए। आज भारतीय अंग्रेजी साहित्य का दृश्य बहुत भरा-पूरा है। बहुत सारे लेखक सक्रिय हैं। रातोंरात नए-नए लेखक पैदा हो रहे हैं, कुछ क्षणिक चमक दिखा कर, एक किताब के साथ फ़ुलझड़ी की तरह फ़ुरफ़ुरी पैदा कर के समाप्त हो जा रहे हैं। कुछ लम्बी रेस के घोड़े हैं, जिनसे पाठकों को बहुत उम्मीद हैं। संचार और यातायात के साधनों में आई अभूतपूर्व प्रगति भी इसका एक कारण है। आज प्रकाशकों से संपर्क साधना, अपनी किताब का प्रचार-प्रसार कर पाना काफ़ी आसान हो गया है। बाजार की माँग को देखते हुए प्रकाशकों की संख्या और दृष्टिकोण में भी काफ़ी परिवर्तन आया है। प्रकाशन व्यवसाय न केवल आसान हो गया है बल्कि ग्लोबल हो गया है। खासकर इंग्लिश आधारित प्रकाशन व्यवसाय खूब फ़ल-फ़ूल रहा है। नई पीढ़ी चाहे वह भारत की हो अथवा किसी अन्य विकासशील देश की हो इंग्लिश उसकी संप्रेषण और पढ़ने की भाषा होती जा रही है। ये प्रकाशक अपने लेखकों को समाज के सामने सेलेब्रेटी बना कर प्रस्तुत करते हैं। लेखक भी न केवल लिखता है वरन अपनी किताब के प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इंग्लिश लेखकों को अच्छी-खासी रॉयल्टी, अक्सर अग्रिम रॉयल्टी मिलती है। इस कारण भी इस ओर काफ़ी नए लोगों का झुकाव हुआ है। शायद इसीलिए एक बार प्रवासी हिन्दी लेखकों को हमारे देश के नॉलेज कमीशन के प्रमुख शैम पैट्रोडा ने अपनी अक्ल का नमूना पेश करते हुए सलाह दे डाली कि आप लोग हिन्दी में क्यों लिखते हैं, इंग्लिश में क्यों नहीं लिखते हैं। इस क्षेत्र में नए-नए लोग आ रहे हैं वे न केवल सहित्य से जुड़े लोग हैं वरन अन्य पेशे से जुड़े लोग भी हैं अत: अपने-अपने क्षेत्र के अनुभवों से इसे समृद्ध कर रहे हैं। चेतन भगत के रचे को साहित्यिक गुणों के लिए उतना नहीं जाना जाता है, जितना युवा, उच्च-मध्यम वर्ग के युवा के अनुभवों को शब्द प्रदान करने के लिए जाना जाता है। ‘फ़ाइव पॉइंट समवन’, ‘थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़’, ‘टू स्टेट्स’, ‘वन नाइट एट द कॉल सेंटर’ उनके उपन्यास हैं। ‘फ़ाइव पॉइंट समवन’ तथा ‘वन नाइट एट द कॉल सेंटर’ पर फ़िल्में भी बनी हैं। अभिजित भादुड़ी की ‘मीडिओकर बट एरोगेंट’ बिजनेस स्कूल जीवन को प्रस्तुत करती है। कॉलेज तथा हॉस्टल को कथानक बना कर लिखे गए चेतन भगत और अभिजित भादुड़ी के ये उपन्यास युवाओं के बीच खूब लोकप्रिय हैं। इनको लिए को पढ़ने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़ती है। आज का भारतीय शहरी युवा इनसे खुद को सरलता से को रेलेट कर पाता है। जैसे अरुंधति राय की जड़ें केरल में हैं वैसे ही डेविड देवीदार भी अपने लेखन में दक्षिण की खुशबू लेकर आते हैं उनका ‘द हाउस ऑफ़ ब्लू मैंगोस’ तमिलनाडु के समाज और जीवन को बहुत रोचक ढ़ंग से प्रस्तुत करता है। आप पहले एक प्रसिद्ध प्रकाशक संस्थान के एजेंट थे। इसी तरह अपनी जड़ों को लेकर श्रीकुमार वर्मा केरल के अनोखे वैवाहिक संबंध (जिसे मलयालम में संबंधम कहा जाता है) को अपने उपन्यास ‘लैमेंट ऑफ़ मोहिनी’ प्रस्तुत करते हैं। इसमें केरल के उच्च जाति के लोगों खासकर नम्बूदरी लोगों के जीवन उनके वैवाहिक संबंध को चित्रित किया गया है। इस नम्बूदरी समाज में परिवार का केवल बड़ा बेटा ही शादी करता है बाकी लड़के राजकन्याओं अथवा नायर स्त्रियों के अस्थाई संबंध बनाते हैं। केरल का यह प्रमुख रिवाज अब समाप्त हो चुका है। श्रीकुमार वर्मा प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा के पड़पोता हैं। अपने उपन्यास में वे कई पीढ़ियों का जीवन चित्रित करते हैं। ‘क्यू एंड ए’ जिस पर ‘स्मल डॉग मिलिनियर’ फ़िल्म बनी और जिसे ऑस्कर मिले के लेखक विकास स्वरूप भी इंग्लैंड में रहते हैं। अभी तक उनका यही एक मात्र उपन्यास सामने आया है मगर ऐसा एक ही काफ़ी है। वैसे इसकी जम कर आलोचना भी हुई क्योंकि उन्हें भी भारत में गरीबी, भिखमंगी ही नजर आई है। विकास भारतीय उच्चायोग, लंदन में काम करते हैं। एक समय के उनके मित्र स्वयं कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा इस उपन्यास को लिखे जाने के समय की बात बताते हुए कहते हैं, कि बातों केदौरान उन्होंने कहा था, “विकास जी जो उपन्यास आप लिख रहे हैं, इसमें बेस्टसेलर होने की सभी खूबियाँ हैं। आप इसे साहित्य समझने के चक्कर में मत पड़िएगा। यह उपन्यास आपको शीर्ष के पापूलर लेखकों की कतर में ला खड़ा करेगा।” और कोई शक नहीं कि ऐसा हुआ। किताब से भी ज्यादा फ़िल्म के साथ ऐसा अवश्य ही हुआ। अभी-अभी अपने विवाह तथा क्रिकेट संबंधित बातों के लिए चर्चित शशि तरूर सरकारी उच्च सेवा में अक्सर भारत से बाहर रहे हैं। उन्होंने कई साल पहले महाभारत से अपने विचार लिए और व्यंग्यात्मक लहजे में ‘द ग्रेट इंडियन नोवेल’ लिखा और साहित्यकारों की जमात में शामिल हो गए। ‘शो बिजनेस’ तरूर का एक अन्य कार्य है। वे अपने साहित्येत्तर लेखन के लिए भी खूब जाने जाते हैं। अभी हाल-फ़िलहाल भारत के अतीत को खंगालते हुए और उसके भविष्य की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने ‘इंडिया: फ़्रॉम मिडनाइट टू मिलेनियम’ लिखा है। संचार और यातायात की सुविधा ने कई लोगों को रातोंरात सेलेब्रेटी बना दिया है। कई बार साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि का न होने पर भी किताब खूब चर्चित हो जाती है। उसे फ़टाफ़ट पुरस्कार और सम्मान भी मिल जाते हैं। भारतीय इंग्लिश लेखन के बढ़ते बाजार की माँग के कारण प्रकाशक भी लेखक को काफ़ी सम्मान देते हैं। असल में दोनों मिलकर काम करते हैं। आज मात्र अच्छा लिखना ही काफ़ी नहीं है। बाजार के दबाव के कारण लेखक को भी पुस्तक के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी वहन करनी पड़ती है। खर्च प्रकाशक उठाता है मगर श्रम और समय लेखक का भी लगता है। यह उसके करारनामे की शर्त होती है। कभी-कभी राजनैतिक और कूटनीतिज्ञ कारणों से भी पुरस्कार दिए जाते हैं। मगर तब पुरस्कार \ सम्मान की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। अरविंद अडिगा को जब अपने व्हाइट टाइगर’ के लिए बूकर मिला तो कुछ ऐसा ही हुआ। भारतीय इंग्लिश रचनाकारों को बुकर मिलना अब सामान्य बात हो गई है लेकिन जब अडिगा को यह मिला तो काफ़ी गर्मागरम चर्चा और आलोचना भी हुई। यहाँ तक कि पुरस्कार की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगने की नौबत आ गई। अरविंद अडिगा का ‘व्हाइट टाइगर’ एक रेसी क्राइम थ्रिलर की तरह है, जिसे पत्र शैली में लिखा गया है। (विस्तार के लिए विजय शर्मा का नया ज्ञानोदय नवम्बर २००८ का अंक देखा जा सकता है।) इस आलेख की सीमा है। यहाँ केवल उन्हीं रचनाकारों पर की बात हुई है जो गद्य, उसमें भी मुख्य रूप से कहानी-उपन्यास की रचना करते हैं। आज इतनी ज्यादा संख्या में भारतीय इंग्लिश साहित्य उपलब्ध है कि सबको एक आलेख में समेटना संभव नहीं है। बच्चों के चहेते देहरादून में रहने वाले प्रसिद्ध रस्किन बॉण्ड को छोड़ने का कोई औचित्य नहीं है पार छोड़ा गया है। गद्य की अन्य विधाओं तथा पद्य रचनाकारों को नहीं लिया गया है। ए के रामानुजम जैसे प्रसिद्ध कवि ने इस विधा को समृद्ध किया है वहीं केकी दारूवाला, नसीम इजाकल, डॉम मोरिस, अरुण कोलाटकार, दिलीप चित्रे जैसे कवि इस साहित्य के अंतरगत आते हैं। और जयंत महापात्र को कैसे छोड़ा जा सकता है। करीब सौ वर्ष की लम्बी आयु पाने वाले तथा ‘द लास्ट इंग्लिश मैन’ के नाम से प्रसिद्ध नीरद चटर्जी ‘दि ऑटोबायग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन’ एक बहुत उम्दा किताब है। परंतु वे ताजिंदगी वे भारत के विषय में अपने विचारों के कारण आलोचना के पात्र बने रहे। जिद के साथ उनका कहना है कि भारत की अपनी कोई संस्कृति न कभी थी न है। जो है वह सारा कुछ समय-समय पर बाहर से आए हुए लोगों के द्वारा आया है। इनकी लिखी मैक्समूलर की जीवनी ‘द स्कॉलर एक्स्ट्राऑडिनरी’ भी पढ़ने लायक है। वेद मेहता को नहीं समाहित किया गया है। क्रूर तथा दयापूर्ण अनुभवों को वेद मेहता एक नेत्रहीन युवा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए सदा याद किए जाते रहेंगे। जिस तरह नॉयपॉल उपन्यास से ज्यादा अपने नॉन-फ़िक्शन के लिए जाने जाते हैं, ठीक उसी तरह सुकेतु मेहता भी नॉन फ़िक्शन ही अधिक लिखते हैं। लोक-साहित्य भी आज दिखाई दे रहा है। संस्मरण भी इस साहित्य में उपलब्ध हैं। नयनतारा सहगल ने ‘ए टाइम टू बी हैप्पी’ तथा ‘दिस टाइम ऑफ़ मॉर्निंग’ जैसे उपन्यासों के साथ-साथ संस्मरण भी लिखे हैं। भारत के पर्यटन उद्योग के विकास के साथ पर्यटन संबंधित साहित्य भी रचा जाने लगा। बशारत पीर का ‘कर्फ़्यूड नाइट’, सामंत सुब्रमनियन का ‘फ़ोलोइंग फ़िश’, सोनिया फ़लेरिओ का ‘ब्यूटिफ़ुल थिंग’ तथा सिद्धार्थ देब का ‘द ब्यूटिफ़ुल‘ एंड द डैम्ड’ इसी तरह का साहित्य है। इंटरनेट, ब्लॉगिंग ने लिखना-प्रकाशित होना सरल कर दिया है अत: जिसको भी लिखने का जरा भी शऊर है वह लिख रहा है जिसमें कचड़ा और मोती दोनों होने की संभावना है। इंटरनेट, ब्लॉगिंग ने लेखन को स्वायत्तता प्रदान की है अब लेखक प्रकाशक या पत्रिका के संपादकों का मोहताज नहीं है वह जब चाहे, जितना चाहे लिख कर खुद प्रकाशित कर सकता है। प्रकाशन के क्षेत्र में एक तरह का जनतंत्र आया है जिसके अपने खतरे भी हैं। ब्लॉगिंग ने बहुत सारे भारतीय मूल के इंग्लिश रचनाकारों को स्पेस और पाठक दिए हैं। नाटक को भी इस आलेख में स्पर्श नहीं किया गया है जबकि महेश दत्तानी बराबर इस क्षेत्र में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। मृणालिनी साराभाई का ‘कैप्टिव सोल’, और गुरुचरण दास का ‘लैरिन्स साहेब’ अलग आलेख की माँग करता है। प्रसिद्ध कॉलमनिस्ट खुशवंत सिंह को भी छोड़ दिया है जबकि उन्होंने विभाजन पर आधारित ‘लास्ट ट्रेन टू पाकिस्तान’ जैसा उपन्यास लिखा है जिस पर फ़िल्म भी बनी है। यह जितना सीरियस है उतनी ही खेतों के बीच युवाओं की मस्ती को भी दिखाता है। मस्ती खासकार शराब, औरत की मस्ती खुशवंत सिंह की विशेषता है। वे लाइट रीडिंग करते हैं मगर साहित्य के साथ-साथ अन्य कई विषयों के जानकार हैं, कुशल संपादक तो वे थे ही। उम्र के आखिरी पड़ाव पर रह रहे इस लेखक के साप्ताहिक कॉलम का पाठकों को बेसब्री से रहता है। उन्हीं की लाइन में हम शोभा डे को भी याद कर सकते हैं। लाइट, पेज थ्री लेखन उनकी विशेषता है। नयनतारा सहगल पिछली पीढ़ी की लेखक हैं। उन्हें न केवल इसलिए कि वे जवाहरलाल नेहरू की भाँजी के रूप में बल्कि उनके जीवंत और गरिमापूर्ण साहित्य के लिए सदैव याद किया जाएगा। उनके संस्मरण ‘प्रिजन एंड चॉकलेट केक’ में लिपिबद्ध हैं। ‘एवरेस्ट होटल’ तथा ‘टोटर-नामा’ के एलन सेली भी यहाँ नहीं हैं। गीता मेहता (ए रिवर सूत्र’ तथा राज’), गीता हरिहरन (‘द थाउजंड फ़ेसेज ऑफ़ नाइट’), मंजु कपूर और कई महिला रचनाकारों की उपस्थिति इस साहित्य में है। इस लेख में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में रह रहे इंग्लिश लेखकों को भी नहीं लिया गया है। उस पर फ़िर कभी और। अभी मुझे उनकी पूरी जानकारी नहीं है इंदिरा गोस्वामी के अलावा किसी को नहीं पढ़ा है। एक लम्बी सूचि है जिन रचनाकारों को यहाँ समाहित किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। समकालीन भारतीय अंग्रेजी लेखन में कई पीढ़ियाँ संलग्न हैं। फ़िर भी यह अपेक्षाकृत एक युवा साहित्य है। अभी इसे बहुत आगे जाना है। हाँ, एक बात तय है कि यह रहने वाला है, टिकने वाला है। दिनोंदिन इसका प्रचार-प्रसार होने वाला है। एक विडंबना ही कही जाएगी कि भारतीय इंग्लिश साहित्य, उसके रचनाकारों तथा भारत की अन्य भाषाओं और उनके रचनाकारों के बीच न के बराबर संबंध है। वे एक दूसरे को शायद ही कभी पढ़ते हैं, एक दूसरे को पहचाना और प्रशंसा करना तो दूर की बात है। कहीं यह उच्च मनोग्रंथि (superiority complex) और हीन मनोग्रंथि (inferiority complex) का मामला नहीं है? जबकि अधिकाँश अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीय लेखकों की मातृभाषा शायद ही इंग्लिश है। अच्छे अनुवाद का अभाव भी इस दूरी का एक कारण है। स्वयं रुश्दी इस बात को स्वीकार करते हैं कि एक व्यक्ति के रूप में हिन्दी-उर्दू, यानि कि उत्तर भारत की हिन्दुस्तानी से उनकी पहचान है। एक लेखक के रूप में, उनके मन के कुछ हिस्से की निर्मिति भारत की तमाम भाषाओं के मुहावरों, लय, पैटर्न, संगीत और आदतों के विचार से हुई है। वे कहना चाहते हैं कि कोई कारण नहीं है, कोई कारण नहीं होना चाहिए कि इंग्लिश भाषा के साहित्य और भारत की अन्य भाषाओं के साहित्य के बीच विरोधी संबंध ही हो। आशा है कि आने वाले समय में यह खाई पटेगी और दोनों तरह के रचनाकार एक दूसरे के नजदीक आएँगे। इनमें आदान-प्रदान होगा। दोनों में भरपूर अनुवाद कार्य होगा एवं इस तरह साहित्य और संपन्न होगा। ०००